नवभारत संपादकीय: अब CEC के खिलाफ महाभियोग का प्रयास
CEC Impeachment Move: लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव विफल होने के बाद विपक्ष अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी में है।
- Written By: अंकिता पटेल
Chief Election Commissioner Impeachment ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Chief Election Commissioner Impeachment: किसी संवैधानिक संस्था के प्रति भरोसा कम होना लोकतंत्र 2 की विफलता माना जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव विफल हो जाने के बाद अब विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी में है। संसद के दोनों सदनों में इसे लेकर मनन जारी है।
200 से अधिक सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस पर दस्तखत कर दिए हैं। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि अनेक अवसरों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने पक्षपात करते हुए सत्तारूढ़ बीजेपी की सहायता की।
विशेषरूप से मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में वह बीजेपी का एजेंडा आगे बढ़ाते हुए नजर आए। टीएमसी प्रमुख व बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट से वास्तविक मतदाताओं के नाम हटा दिए।
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इस नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर 7 आरोप लगाए गए हैं। इनमें भेदभाव और पक्षपातपूर्ण रवैया। चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर रूकावट डालना तथा बडे पैमाने पर मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित करना शामिल है।
सीईसी को पद से हटाने के लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से स्पीकर या सभापति को नोटिस देना पड़ता है। यह नोटिस स्वीकार कर लिया गया तो मामले की जांच के लिए 3 सदस्यों की समिति बनाई जाती है।
अगर समिति ने आरोपों को सही पाया तो दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना पड़ता है। विपक्ष अल्पमत में होने से ऐसा प्रस्ताव मंजूर होने की संभावना नहीं नजर आती।
इसके बावजूद यदि सरकार नोटिस को अनदेखा करती है तो सरकार व सीईसी की मिलीभगत को लेकर संदेह गहराएगा। अब तक भारत में 25 मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके हैं जिनमें सबसे प्रभावशाली टीएन शेषन को माना गया।
उन्होंने कानून का इस्तेमाल करते हुए चुनावी धांधली रोकने तथा निर्वाचन को स्वतंत्र व निष्पक्ष बनाने का पूरा प्रयास किया था। इतने पर भी संसद में 1991 में शेषन की मुख्य चुनाव आयुक्त पद से हटाने की मांग को लेकर हंगामा हुआ था।
इसके बाद सरकार ने शेषन के अधिकारों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से चुनाव आयोग को त्रिसदस्यीय बना दिया था। संविधान निर्मात्री सभा में चर्चा के दौरान डॉ. आंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया था कि चुनावी मशीनरी सरकार के दबाव या नियंत्रण से बाहर और पूरी तरह निष्पक्ष रहनी चाहिए, यही सिद्धांत 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बनेवाल विरुध्द भारत सरकार मामले में भी दोहराया था।
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सुको ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों का चयन 3 सदस्यीय समिति करे जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शामिल हो।
इसके कुछ माह बाद ही सरकार ने नया कानून लागू कर ऐसी चयन समिति बनाई जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता का समावेश था। इसमें सीजेआई को शामिल नहीं किया गया। इस तरह इस समिति में सरकार का 2-1 से बहुमत हो गया।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
