नवभारत संपादकीय: क्या अमेरिका AI पर बढ़ा रहा है तकनीकी नियंत्रण? विकास के लिए चाहिए उच्चस्तरीय एआई
US AI Policy: उन्नत एआई तकनीक पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर भारत समेत कई देशों में चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक सहयोग प्रभावित होगा और तकनीकी निर्भरता बढ़ सकती है।
- Written By: अंकिता पटेल
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एआई नीति,(सोर्स: सोशल मीडिया)
US AI Export Restrictions: भारत को विकास के लिए उच्चस्तरीय एआई चाहिए, लेकिन ट्रंप सरकार ने आदेश दिया है कि उच्चकोटि का एआई गैरअमेरिकी लोगों तक पहुंचने न पाए, यह आदेश कृत्रिम बुध्दिमत्ता के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग के खिलाफ है। साथ ही यह भारत तथा अन्य देशों के लिए भी अहितकर है। इन सभी को एआई के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ेगा।
अमेरिका एआई में समूची दुनिया में अग्रणी है। दूसरे क्रमांक पर चीन आता है, लेकिन विशेषज्ञों की राय में चीन के मॉडेल अमेरिका की तुलना में काफी पीछे हैं। अमेरिका ने जो प्रतिबंध लगाया है, वह एंथ्रोपिक के मायथोज 5 व फैबल 5 मॉडेल्स के लिए है। गत सप्ताह फैबल 5 जारी किया गया। यह उच्च क्षमता वाले मायथोज का सार्वजनिक संस्करण है, जिसे कड़ी सुरक्षा शर्तों के साथ जारी किया गया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के चलते उन्नत एआई मॉडल पर बढ़ रही वैश्विक पाबंदियां
अमेरिकी सरकार को लगता है कि यदि यह गलत हाथों में पहुंचा, तो काफी नुकसान पहुंचा सकता है। मिसाल के तौर पर फैबल 5 सरकार के कंप्यूटर सिस्टम की कमजोरियां या न्यूनताएं खोज सकता है और साइबर अटैक कर सकता है। अमेरिका को आशंका है कि उसकी रक्षा प्रणाली सहित अन्य सिस्टम पर अटैक हो सकता है। इसलिए फैबल 5पर अचानक प्रतिबंध लगाया गया है।
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इससे स्पष्ट है कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और चीन अपने श्रेष्ठ एआई मॉडेल्स को स्वयं के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखेंगे। शेष कम क्षमता वाले मॉडेल्स जारी किए जा सकते हैं, लेकिन उनके लिए भी कुछ शतों सहित प्रतीक्षा करनी होगी। एआई किसी सॉफ्टवेयर की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण व बढ़-चढ़कर है।
एआई में पिछड़ने से बचने के लिए भारत को बढ़ाना होगा निवेश और आत्मनिर्भरता
यह मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर, वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके नवीनतम व श्रेष्ठ मॉडेल से कोई भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। इस तरह इस मामले में अन्य देश पीछे रहेंगे। इस असुविधा से कैसे पार पाया जाए? एक रास्ता यह है कि सारे देश एआई को विकसित करने की दिशा में आपस में सहयोग करें। आर्थिक दृष्टि से यह काफी महंगा है। क्योंकि चिप्स, डाटा सेंटर, एनर्जी व रिसर्च जुटाने होंगे। विभिन्न राष्ट्रों के बीच ऐसा व्यापक सहयोग शायद ही संभव हो पाएगा।
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दूसरा उपाय यह है कि देश अपना एआई इकोसिस्टम विकसित करे जिसमें चिप्स से लेकर फाउंडेशनल मॉडेल्स व एप्स खुद ही निर्मित करने होंगे। यूरोप इस मुद्दे को लेकर गंभीर है। यूरोपीय देश ऐसी पहल कर सकते हैं। भारत में भी इसे लेकर विचार होता रहा है लेकिन एआई विकसित करने की लागत बहुत ज्यादा है। एक तरफ अल्फाबेट, अमेजन, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट इस पर 650 अरब डॉलर खर्च करने का इरादा रखते हैं। वहीं, भारत ने गत वर्ष वैश्विक लागत का केवल 0.6 प्रतिशत फंड इसके लिए रखा था। इसी वजह से ताईवान और दक्षिण कोरिया हमसे आगे निकल गए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
