नवभारत विशेष: वन नेशन, वन इलेक्शन: क्या भारत इंडोनेशिया की गलती दोहराएगा?
One Nation Election: वन नेशन, वन इलेक्शन के समर्थक खर्च और समय बचाने की बात करते हैं, लेकिन इंडोनेशिया का अनुभव बताता है कि एक साथ चुनाव कराने की मानवीय और प्रशासनिक कीमत भी बड़ी हो सकती है।
- Written By: अंकिता पटेल
वन नेशन वन इलेक्शन सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो
One Nation One Election: भारत के ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (ओएनओई) प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से खर्च कम होगा। लंबे समय तक सुरक्षा बल तैनात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, आचार संहिता की वजह से होने वाली दिक्कतें कम होंगी और राजनीतिक पार्टियों को लगातार चुनावी अभियान मोड में रहने से रोका जा सकेगा। हालांकि, इंडोनेशिया का अनुभव एक चेतावनी भरा सबक देता है।
2019 में इंडोनेशिया ने राष्ट्रपति, आम चुनाव और क्षेत्रीय विधानसभा और लोकल काउंसिल के लिए एक दिन का ऐतिहासिक चुनाव कराया था। इसकी एक दुखद इंसानी कीमत चुकानी पड़ी। लगभग 900 चुनाव कर्मचारी मारे गए और 5,000 से ज्यादा गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।
2024 में फिर से भारी नुकसान हुआ, जब 100 से ज्यादा मौतें और लगभग 15,000 बीमार पड़े। जून 2025 में कॉर्नस्टट्यूशनल कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव 2029 से अलग-अलग दो से ढाई साल के अंतर पर होने चाहिए, भारत में इस बारे में सबसे बड़ा ब्लूप्रिंट पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी उच्च स्तरीय समिति में सामने आया।
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‘एक देश-एक चुनाव’ पर संघीय ढांचे को लेकर सवाल
प्रस्तावित आर्टिकल 82ए राष्ट्रपति को एक ‘तय तारीख’ बताने का अधिकार देता है, जिससे सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के चक्र के साथ जुड़ जाएगा। इस तारीख के बाद बनी विधानसभाओं का कार्यकाल कम कर दिया जाएगा। भले ही उनका 5 साल का कार्यकाल खत्म न हुआ हो। इसके अलावा यह भारतीय चुनाव आयोग को यह अधिकार देता है कि अगर एक साथ चुनाव कराना मुमकिन नहीं होता है, तो वह राज्य चुनावों को टालने की सिफारिश कर सकता है।
आर्टिकल 83, 172 और 327 में बदलाव का प्रस्ताव है, जो गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करता है। एस। आर। बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994) में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संघवाद संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। राज्य सिर्फ प्रशासनिक ईकाई नहीं, बल्कि उनकी एक स्वतंत्र संवैधानिक पहचान है। इसके उलट संसद, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकाय के लिए अलग-अलग चुनाव एक लगातार फीडबैक मैकेनिज्म बनाते हैं, जिससे सरकारें आमजन की संवेदनाओं पर ध्यान देती हैं।
मध्यावधि चुनाव जवाबदेही बनाए रखते हैं
बिना राइट ऑफ रिकॉल वाले सिस्टम में वे जवाबदेही के सबसे अच्छे तंत्र के तौर पर काम करते हैं। मध्यावधि चुनाव से कम बहुमत वाली सरकारें बनेंगी, जिससे चुनाव सिर्फ कवायद बन जाएंगे और वोटर की अवहेलना का खतरा होगा। यह शासन की जवाबदेही को कमजोर करता है, क्योंकि बचे हुए कार्यकाल की सरकारों में स्ट्रक्चरल रिफॉर्म के लिए इंसेंटिव की कमी होती है।
चुनावी खर्च कम करने का तर्क संसदीय स्थायी समिति के अनुमानों से पता चलता है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव का कुल खर्च लगभग 4,500 करोड़ (2015-16), जो केंद्रीय बजट का लगभग 0.25% और जीडीपी का 0.03% है। पीआरएस डाटा से पता चलता है कि लोकसभा चुनाव का खर्च पहले जीडीपी का 0.02%-0.05% (1957-2014) था। चुनाव चरणों में होते हैं, मसलन 2024 में 82 दिन, जिससे चुनीव आयोग को ईवीएम, वीवीपैट और सिक्योरिटी फोर्स को रोटेट करने की इजाजत मिलती है।
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हर राज्य की विशिष्ट पहचान
एक साथ चुनाव कराने से यह लचीलापन खत्म हो जाएगा और महंगे नए संसाधनों की जरूरत होगी, जिससे प्रशासनिक फायदे कमजोर पड़ जाएंगे। क्या जीडीपी का 1% बचाने के लिए संविधान में बदलाव करना और संघीय व्यवस्था को कमजोर करना समझदारी है? चुनाव कोई अतिरिक्त खर्च नहीं है जिसे कम किया जा सके, इसके बजाय यह सेल्फ गवर्नमेंट की बार-बार होने वाली कीमत है, जिससे यह पक्का होता है कि सत्ता लोगों के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
