नवभारत विशेष: अविश्वास के निशाने पर स्पीकर बिड़ला

Om Birla Motion: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया है। संसद के इतिहास में इससे पहले भी तीन बार स्पीकर के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव आए, लेकिन अब तक कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं।
Navbharat Special: Speaker Birla in the Crosshairs of No-Confidence
Om Birla no confidence motion ( सोर्स: सोशल मीडिया)
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No Confidence Speaker: संसद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला पर अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला फरवरी 2026 में विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर के जरिए हुआ था और जब 9 मार्च को बजट सत्र में इसे चर्चा के लिए पेश किया गया, तो 50 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए।

क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष को अपने पद से हटाने के लिए संसद में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है और विपक्ष के पास यह बहुमत नहीं है। इसलिए यह तो पहले से तय है कि ओम बिड़ला को विपक्ष उनके पद से हटा नहीं सकता, लेकिन उन पर जिस तरह से यह प्रस्ताव लाया गया है और जो आरोप लगाए गए हैं, उससे न सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष बल्कि मौजूदा संसद की भी गरिमा कम होती है।

अब तक विपक्ष द्वारा अलग-अलग समय पर चार लोकसभा अध्यक्षों पर अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। सबसे पहले यह अविश्वास प्रस्ताव 1954 में लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर पर लाया गया था।

इसके बाद 1966 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ, 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ और अब 2026 में ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है, लेकिन अभी तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध यह प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

आखिर उतने गरिमामय पद पर पहुंचने वाले लोगों पर इस तरह के आरोप क्यों लगते हैं? कारण यही होता है कि लोकसभा अध्यक्ष आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के सदस्यों का समय-समय पर साथ देते हैं। क्योंकि आमतौर पर वह सत्तारूढ़ पार्टी अथवा गठबंधन से ही होते हैं।

इस तरह उन पर एक तरह से संसद में अपने पक्ष के सांसदों को संरक्षण देते देखा जाता है, जो कि लोकतंत्र के लिए घातक है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के मामलों में यह तीन कारणों से बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस तरह उनके खिलाफ 118 सांसदों ने हस्ताक्षर करके प्रस्ताव लाने की भूमिका बनाई, वह सीधे संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।

क्योंकि राजनीतिक पार्टियां समग्रता में संसद भारतीय लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, ऐसे में जब अध्यक्ष पर पक्षपात का आरोप लगता है, तो यह आरोप किसी एक व्यक्ति, किसी एक पार्टी या किसी एक गठबंधन तक सीमित नहीं रहता।

यह कलंक समूचे भारतीय लोकतंत्र का हो जाता है, जिस तरह से सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे के साथ सदन में व्यवहार करते हैं, उसे देखकर एक आम लोकतंत्र प्रेमी और हितैषी व्यक्ति का तो दिल ही टूट जाता है।

सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर इन दिनों कतई विश्वास नहीं करते। यह अविश्वास न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि लोकतंत्र पर सवालिया निशान खड़ा करता है। अगर संसद में दो पक्ष यानी सत्ता पक्ष और विपक्ष किसी भी मुद्दे पर, किसी भी स्थिति में एकमत न हों तो फिर लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाता है? लोकतंत्र का मतलब सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल, खेलना नहीं होता बल्कि सही मायनों में असहमति के बावजूद एक तार्किक सहमति से देश को आगे बढ़ाने का राजनीतिक उपाय होता है।

लेकिन अब कुछ ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे की किसी भी बात की जरा भी महत्व नहीं देते। विपक्ष, सत्ता पक्ष के किसी भी काम को कभी स्वीकृति नहीं देता, तो सत्ता पक्ष विपक्ष को महत्त्वपूर्ण मानने से ही इनकार करता है।

विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ओम बिड़ला विभिन्न बहसों में विपक्ष को बोलने का मौका ही नहीं देते। अगर उन्हें कभी मौका मिला भी तो उनके माइक बंद कर दिए जाते हैं।

प्रस्ताव पास होना नामुमकिन

सत्ता पक्ष का मानना है कि वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला पर लाया गया अविश्वास प्रस्ताव वास्तव में राजनीतिक स्टंट है। विपक्ष इस बात को सही नहीं मानता, विपक्ष का कहना है कि मौजूदा सरकार संसद में असहमति को ताकत के जरिए कुचलने की कोशिश कर रही है।

इसलिए लोकतंत्र की लड़ाई इतनी उग्र और व्यक्तिगत हो गई है। सरकार की नैतिक स्थिति सवालिया घेरे में है और राजनीतिक माहौल में लगातार ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।

लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा

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