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नवभारत विशेष: दलबदल का दिनोंदिन गहराता दलदल, टीएमसी के बाद अब शिवसेना (यूबीटी)
- Written By: अंकिता पटेल
NDA Expansion Strategy: विपक्षी दलों में कथित टूट और सांसदों की बगावत के दावों के बीच लोकसभा में नए राजनीतिक समीकरण बनने और एनडीए की ताकत बढ़ने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Opposition MPs Joining NDA: पहले राघव चड्डा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) के 7 सांसद अलग होकर बीजेपी में शामिल हो गए, फिर बंगाल में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हुई, उसके 20 सांसद बागी होकर नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए। तृणमूल बागियों ने सत्तारूढ़ एनडीए का हिस्सा बनने के लिए एक नये रास्ते का चयन किया है।
अब शिवसेना (उद्धव) के 9 में से 6 सांसद बागी हो गए हैं और प्रबल संकेत यह हैं कि वह शिवसेना (शिंदे) में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करेंगे। बागी सांसदों के नेताओं ने लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात करके लोकसभा के 9 में से 6 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। पार्टियों की तोड़-फोड़ से ऐसा प्रतीत होता है कि बीजेपी अपने अप्रैल के लेजिस्लेटिव पैकेज को सदन में पुनः लाने की तैयारी कर रही है और उसके लिए दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ कर रही है।
दल-बदल पर सख्ती और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही बढ़ाने की मांग
बुनियादी प्रश्न हैं, क्या दलबदल कानून मात्र कागज का टुकड़ा बनकर रह गया है? एक मतदाता जब चुनाव में अपने क्षेत्र से किसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करता है, तो वह उसकी राजनीतिक पार्टी की विचारधारा से सहमत होने के कारण करता है या उसे विश्वास होता है कि संबंधित पार्टी अपने वायदों व घोषणापत्र के अनुसार कार्य करेगी, सत्ता में आने के बाद। ऐसे में प्रतिनिधि जब अपनी मजबूरी, लालच, दबाव या किसी अन्य कारण से दलबदल कर लेता है, तो बेचारा मतदाता ठगा सा रह जाता है।
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इस स्थिति में क्या यह अनिवार्य नहीं होना चाहिए कि सांसद व विधायक न तो उस पार्टी को छोड़ सकें जिससे जीतकर आये हैं और न उसे तोड़ सकें? अगर वह अपनी पार्टी के नेतृत्व से असहमत हैं तो उन्हें अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर पुनः जनता के समक्ष जाना चाहिए, इसके अतिरिक्त मतदाताओं को भी बागी हुए अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। यह लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
बढ़ते दल-बदल के बीच एंटी-डिफेक्शन कानून की प्रभावशीलता पर सवाल
वर्तमान घटनाक्रम संविधान की दसवीं अनुसूची जिसे एंटी-डिफेक्शन लॉ या दल-बदल विरोधी कानून भी कहते हैं को फोकस में ले आता है। यह कानून 1985 में चुने हुए प्रतिनिधियों की इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था कि वह एक पार्टी से दूसरी में कूदकर तख्ता पलटते हैं। इस कानून के तहत सदन के पीठासीन अधिकारी को यह अधिकार प्रदान होता है कि एक सदस्य की याचिका पर दलबदलू को अयोग्य घोषित कर दे। इस कानून में दो प्रकार के दलबदल का संज्ञान है 1।
सदस्य अपनी इच्छा से उस पार्टी की सदस्यता त्याग दे जिसके चुनाव चिन्ह पर वह चुना गया था; 2 सदस्य पार्टी द्वारा जारी की गई मतदान व्हिप का जानबूझकर उल्लंघन करे या मतदान से अनुपस्थित रहे। हालांकि पार्टी व्हिप का उल्लंघन अयोग्य घोषित किये जाने का सीधा तरीका है, लेकिन अन्य तरीके विवाद व मुकदमों का स्रोत रहे हैं।
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‘अपनी इच्छा से सदस्यता छोड़ना’ साधारण त्यागपत्र व औपचारिक रूप से दूसरी पार्टी में शामिल होना नहीं है। जब बहुत अधिक दल-बदल होने लगा व पार्टियां टूटने लगीं तो 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिये पैराग्राफ 3 को दसवीं अनुसूची से हटा दिया गया, जिसमें ‘विभाजन’ का अपवाद प्रावधान था। इस पृष्ठभूमि में यह सवाल उठता है कि क्या एंटी-डिफेकशन लॉ अर्थहीन हो गया है?
टीएमसी के बाद अब शिवसेना (यूबीटी)
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार एक लेजिस्लेटिव पैकेज संसद के विशेष अधिवेशन में लेकर आई, जिसका उद्देश्य लोकसभा की सीटों को 545 से बढ़ाकर 850 करना, 2011 की जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों का परिसीमन करना और लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को 2026 की जनगणना की शर्त से अलग करना था, चूंकि 131वें संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी, जो सरकार के पास न था, इसलिए यह पैकेज पारित न हो सका, जोकि महिला आरक्षण कानून की आड़ में लाया जा रहा था। इसके बाद जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गए तो राजनीतिक पार्टियां अचानक टूटने लगीं या तोड़ी जाने लगीं।
लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा
Nda expansion opposition party defections lok sabha majority strategy
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