संपादकीय: महापालिका चुनाव में मौकापरस्ती हावी

Municipal Elections: महापालिका चुनावों में विचारधारा नहीं, अवसरवाद हावी है। बदलते गठबंधन, आयातित उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी ने चुनाव को सत्ता की जंग बना दिया है।
Mumbai Election, Maharashtra
महापालिका चुनाव में मौकापरस्ती हावी (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: महापालिका चुनाव फ्री-स्टाइल शैली में हो रहे हैं। किसी शहर में बीजेपी और शिवसेना शिंदे के बीच गठबंधन है तो किसी अन्य शहर में ये दोनों पार्टियां प्रतिद्वंद्वी बनी हुई हैं। कहीं ऐसा भी है कि बीजेपी को चुनौती देने के लिए अजीत पवार और शरद पवार की पार्टियों ने आपस में हाथ मिला लिया है। इससे स्पष्ट है कि 15 जनवरी को होनेवाले इस चुनाव में कोई विचारधारा नहीं बल्कि अवसरवाद व्याप्त है। बीजेपी एक समय खुद को पार्टी विद डिफरेंस (दूसरों से अलग दल) बताया करती थी। अब उसका नेतृत्व किसी भी दूसरी पार्टी से आए मजबूत नेता को स्वीकार कर लेता है। उसके लिए अपने कार्यकर्ताओं को अवसर देना जरूरी नहीं रह गया है।

बीजेपी ने 19 महापालिकाओं में ऐसे 337 उम्मीदवारों को टिकट दिया है जो दूसरी पार्टियों से आयात किए गए हैं। इस वजह से बीजेपी को अपने ही कार्यकर्ताओं का असंतोष झेलना पड़ रहा है। ऐसे लोगों को भी उम्मीदवारी दी गई है जिनकी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है। चुनाव क्षेत्र को विकसित करने और वहां प्रभाव मजबूत करने का काम स्थानीय दबंगों पर छोड़ दिया गया है जो अपना स्वार्थ पहले देखते हैं। कुछ शहरों में बीजेपी कार्यालयों पर हमला, लूटपाट व तोड़फोड़ का नजारा देखा गया, कहीं मंत्रियों के वाहनों पर स्याही फेंकी गई। स्थानीय मुद्दों को कोई भी पार्टी गंभीरता से उठाती दिखाई नहीं देती। शहरों के बेतरतीब विस्तार ने अनेक समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं जिनसे नागरिक परेशान हैं। टूटी और उखड़ी सड़कें, फुटपाथ पर अतिक्रमण, अंडरपास में बहता गंदा पानी, अव्यवस्थित यातायात का नजारा शायद नेताओं को दिखाई नहीं देता।

नेताओं और बिल्डरों ने हाथ मिला लिया है जिससे अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। नाशिक से लेकर उत्तर महाराष्ट्र तक कुछ नेताओं ने अपना राजनीतिक लाभ देखते हुए बार-बार पार्टी बदली है। नाशिक में शिवसेना (उद्धव) के 2 स्थानीय नेताओं ने पहले तो उद्धव व राज ठाकरे के हाथ मिलाने पर जश्न मनाते हुए कहा कि बीजेपी को गंगा में बहा देंगे, फिर दूसरे ही दिन ये नेता बीजेपी में चले गए। इस तरह की मौकापरस्ती और बेईमानी नजर आने लगी है। पुणे में अजीत पवार की पार्टी खुलकर बीजेपी को चुनौती दे रही है। एक ही सरकार में रहने के बावजूद महापालिका चुनाव में पार्टियां व उनके नेता आपस में जमकर भिड़ रहे हैं। अजीत पवार ने जहां पिंपरी-चिंचवड में भ्रष्टाचार के बहाने बीजेपी पर निशाना साधा वहीं बीजेपी ने अजीत को उनके पुराने पन्नों की याद दिलाई। बावनकुले ने कहा कि पुराने पन्ने पलटें तो अजीत बोल नहीं पाएंगे।

महायुति की 68 स्थानों पर निर्विरोध जीत के लिए विपक्षी दलों ने नाराजगी दिखाई और उसे भ्रष्टाचार बताया तो मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा- तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं! महापालिका चुनाव को मिनी विधानसभा चुनाव माना जाता है लेकिन इसमें कहीं कोई सिद्धांतवादिता नजर नहीं आती। किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना ही मुख्य ध्येय बनकर रह गया है।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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