राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे (सौ. डिजाइन फोटो )
नवभारत डिजिटल डेस्क: उद्धव व राज ठाकरे मराठी माणुस और मराठी अस्मिता के नाम पर मुंबई महापालिका चुनाव को देखते हुए बहुत देर से एकजुट हुए लेकिन मराठी भाषियों सहित मुंबई के मतदाताओं ने उन्हें ठुकरा दिया।
1970 से लगातार मुंबई में शिवसेना को मेयर पद मिलता रहा। 1997 से लगातार 25 वर्षों तक शिवसेना का मुंबई मनपा पर पूरा कब्जा बना रहा। बड़े-बड़े वादों के बाद भी मुंबई की समस्याएं बरकरार रहीं। ठाकरे के नेतृत्व में मुंबई में चुनावी सफलता का एक ही फार्मूला था।
मुंबई के वार्ड में औसत रूप से 50,000 मतदाता रहते हैं जिनमें से 25,000 वोट नहीं डालते। बचे हुए 25,000 में शिवसेना के 8,000 से लेकर 9,000 तक निष्ठावान वोटर रहते हैं। चुनाव में बहुत से मतदाताओं के वोट आपस में बंट जाते हैं इसलिए शिवसेना चुनाव जीत पाती थी।
शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे ने इसी तरह शिवसेना को मुंबई में मजबूत किया था। तब शिवसैनिक सक्रिय थे और मनपा से जुड़ी नागरिकों की समस्या हल करते थे। 1970 व 80 के दौरान वह अपनी एम्बुलेंस से मरीजों को अस्पताल पहुंचाते थे और जरूरी चीजें मुहैया कराते थे। अब जनता की आकांक्षाएं बढ़ गई हैं। लोग लाभप्रद योजनाओं को अपना हक समझते हैं। पिछले 25 वर्षों में मुंबई की हालत जरा भी नहीं फुटपाथ नदारद, सुधरी। सड़कें खराब और नागरिक भ्रष्टाचार, इन बातों से जनता में सुविधाओं का अभाव और रोष था। ऐसे में मराठी अस्मिता और हिंदी विरोध की बात कौन सुनता ?
बाल ठाकरे जैसा प्रभाव उद्धव व राज में नहीं था। गुजराती उद्योगपतियों व निवेशकों के खिलाफ आरोपों का असर नहीं हुआ। इन्हीं व्यवसायियों को ठाकरे अपने घर में बुलाते थे। गुजरातियों के खिलाफ बोलने का प्रभाव उल्टा पड़ा क्योंकि मोदी की लोकप्रियता मुंबई में भी कम नहीं है।
ठाकरे बंधुओं ने बीजेपी को गुजराती व्यापारियों और उत्तर भारतीयों की पार्टी बताया। जनहित में कामकाज की बजाय भूमिपुत्रों को भड़काने की कोशिश की गई। इसके विपरीत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी ने राजनीतिक परिपक्वता दिखाई और विकास की नीति पर जोर दिया।
एकनाथ शिंदे ने भी दिखा दिया कि उद्धव पर वह भारी पड़ते हैं। राज ठाकरे की मनसे सफलता से बहुत दूर रही। चुनाव में ब्रांड ठाकरे चल नहीं पाया। मुंबईवासी चाहते हैं कि महापालिका शहर को बेहतर बनाने पर ध्यान दे। नेताओं ने मुंबई की समस्याएं दूर करने के जो भी वादे किए, वह पूरे नहीं हुए। जब शरद पवार मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुंबई को दूसरा सिंगापुर बनाने की बात कही थी।
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बाद में नारायण राणे ने भी ऐसा ही वादा किया था। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए मुंबई को शंघाई जैसा बनाने की बात कही थी। मुंबईवासी इतने बड़े वादे नहीं चाहते लेकिन अपनी बुनियादी नागरिक समस्याओं का हल चाहते हैं। महापालिका से उनकी उम्मीद है कि 75,000 करोड़ रुपये के बजट का सदुपयोग करे।