युद्ध की दृश्य (डिजाइन फोटो)
Mental Impact of War: साहस अच्छा है, लेकिन साहस जब मर्यादा तोड़ दे तो वह वहशीपन बन जाता है। रावण साहसी था और मेघनाथ भी। साहसी दुर्योधन भी था और दुशासन भी। लेकिन जब इनके साहस ने मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किया, तो ये दरिंदे बने और और स्वयं के विनाश का कारण भी। साहसी लक्ष्मण भी थे, लेकिन मर्यादा (राम) के साथ ने उन्हें कभी निरंकुश नहीं होने दिया। इस पृथ्वी का एक ही ठेकेदार है, जो अनंतकाल से अपनी मन मर्जी चलाए जा रहा है। प्रकृति के नियमों से उसका कोई सरोकार नहीं। उसके अपने नियम हैं, उसके अपने मानदंड। इन सबके केंद्र में बस उसका स्वयं का स्वार्थ है। मानव नाम का यह जीव ही पृथ्वी में ऐसा बारूद भर रहा है, जो उसके ही विनाश का कारण बन जाएगा।
वर्तमान में समूचा विश्व आक्रांताओं के खौफ से ग्रसित है। युद्ध में कूद चुके कई देश, एक दूसरे का मटियामेट करने को तत्पर हैं। रिहायशी इलाके भी अब मिसाइलों के निशाने पर हैं। हजारों बेगुनाह मारे जा रहे हैं। चहुंओर भय और अनिश्चितता का वातावरण है। बड़े-बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष पृथ्वी की सुरक्षा के नाम पर, पृथ्वी का ही खात्मा करने को आमादा हैं। बच्चे, बूढ़े, जवान गाजर-मूली की तरह कट रहे हैं। चिड़ियों, चीतों और अन्य प्रजातियों के संरक्षण का दम ठोकने वाली मानव जाति, मानवों का जिस तरह कत्लेआम कर रही है, वह निश्चित ही मानव सभ्यता के लिए शर्म का विषय होना चाहिए।
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प्रत्यक्ष रूप से युद्ध प्रभावित देशों के नागरिक तो बुरी तरह से त्रस्त होकर भीतर से टूट ही जाते हैं। अपने को खोने का जीवनभर का गम उन्हें मिल जाता है। रोटी, पानी और मकान की मूलभूत सुविधाएं भी कइयों की छिन जाती हैं। अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाने से आगामी कई वर्षों के नए संघर्ष का दौर शुरू हो जाता है। लंबा मानसिक संताप और नकारात्मक माहौल आगे की दो-तीन पीढ़ियों की पूरी वृत्ति को ही परिवर्तित कर देता है। वंशानुगत परिवर्तन अभिव्यक्त हो जाता है। परोक्ष रूप से अन्य देशों पर भी इसका प्रभाव होता है। चाहे महंगाई से, अपने निवेश के अवमूल्यन से, अनिश्चितताओं से या अंधकारमय भविष्य के भय से! जिनके सगे संबंधी इन क्षेत्रों में फंस जाते हैं उनकी नींद उड़ जाती है। मन में एक दृश्य बनता है।
कल ऐसी किसी स्थिति का सामना, हमें भी भविष्य में करना पड़े तो व्यक्तिगत और मानसिक रूप से हमारी क्या तैयारी होनी चाहिए। मानसिक संबल बना रहे, हर स्थिति में स्वीकार का भाव विकसित हो सके, न्यूनतम मूलभूत सुविधाओं की अपर्याप्तता में भी घोर विचलन से द्रवित न हो पाएं, लंबे समय के नैराश्य भरे वातावरण में भी स्वयं को संभाल पाएं, किसी भी तरह की बड़ी हानि में भी स्वयं को खड़ा रखने की हिम्मत जुटा पाएं, ऐसे कुछ गुणों के विकास के बारे में भी व्यक्ति को सोचना चाहिए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा