प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Kashmir Terror Threat Alert: 1990 के दशक में एक्टिव रहे ग्रुप मुस्लिम जांबाज फोर्स ने भी पोस्टर लगाकर कश्मीर की आजादी तक जंग जारी रहने की धमकी दी है। इन धमकियों के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीरी पंडितों को अलर्ट रहने की हिदायत दी है। विशेषकर कश्मीरी पंडितों से कहा गया है कि वे अनजान नंबरों से आने वाले फोन न उठाएं, शाम होने से पहले घर आ जाएं, अजनबियों से दूर रहें।
अंधेरे में बाहर न निकलें और कोई संदिग्ध दिखे, तो सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत खबर करें। आतंकी धमकियों और उसके बाद सुरक्षा एजेंसियों की हिदायतों ने एक बार फिर उस सच्चाई को उजागर कर दिया कि आतंकवाद केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि एक वैचारिक और रणनीतिक चुनौती है।
विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद कश्मीर घाटी में लौटे कश्मीरी पंडितों को मिली धमकियों ने यह सवाल और गंभीर बना दिया है कि क्या तीन दशक के बाद भी उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी है? कश्मीरी पंडितों का विस्थापन 1990 के दशक की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक था, जब आतंकवादियों ने चुन-चुनकर उन्हें निशाना बनाया और घाटी से उनका लगभग पूर्ण पलायन हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार की पुनर्वास योजनाओं और सुरक्षा आश्वासनों के चलते हजारों पंडित परिवार वापस लौटे। लेकिन नवंबर 2025 में पहले दिल्ली विस्फोट और उसके बाद घाटी में जारी धमकियों ने इस पुनर्वास प्रक्रिया पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।
धमकियों का यह नया दौर दरअसल भव का मनोवैज्ञानिक युद्ध है। हाल के महीनों में कई कश्मीरी पंडित कर्मचारियों, शिक्षकों और सरकारी
कर्मियों को अज्ञात संगठनों की ओर से धमकी भरे पत्र, फोन कॉल और सोशल मीडिया संदेश मिले हैं। इन संदेशों में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि वे घाटी छोड़ दें या गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
आतंकवादी संगठनों की रणनीति हमेशा से रही है कि वे किसी बड़े हमले से ज्यादा भय का वातावरण बनाए रखें, जिससे समुदाय स्वयं असुरक्षित महसूस करके घाटी छोड़ने को मजबूर हो जाए।
यह रणनीति 1990 के दशक में सफल रही थी और अब फिर से उसी पैटर्न को दोहराने की कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सुरक्षा अभियानों ने आतंकवादियों के कई नेटवर्क को कमजोर किया था।
उम्मीद थी कि इससे आतंकवादियों का मनोबल टूटेगा और हिंसा में कमी आएगी। लेकिन इसके विपरीत, हाल के महीनों में धमकियों और छोटे हमलों में वृद्धि देखी गई है।
जब आतंकवादी संगठनों की संरचना कमजोर होती है, तो वे अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए ‘हाई-विजिबिलिटी टारगेट’ चुनते हैं। कश्मीरी पंडित, जो भारत की धर्मनिरपेक्षता और पुनर्वास नीति का प्रतीक हैं, ऐसे ही लक्ष्य बन जाते हैं।
सरकार ने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें सुरक्षित आवास, सरकारी नौकरियां और विशेष कॉलोनियों का निर्माण शामिल हैं। हजारों पंडित कर्मचारी इन योजनाओं के तहत घाटी में काम कर रहे हैं।
लेकिन वास्तविकता यह है कि इन कर्मचारियों में से कई अब भी अलग-थलग कॉलोनियों में रहते हैं, जो उन्हें समाज से अलग और अधिक असुरक्षित बनाती हैं।
आतंकी एक बार फिर से कश्मीर में किसी खौफनाक दुस्साहस की फिराक में हैं। कश्मीरी पंडितों को 3 फरवरी 2026 से अब तक टारगेट किलिंग की कई धमकियां मिली हैं।
5 फरवरी को गृहमंत्री अमित शाह की प्रस्तावित कश्मीर यात्रा के दो दिन पहले ही आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी ग्रुप द रेजिस्टेंस फोर्स यानी टीआरएफ की तरफ से यह धमकी दी गई।
कश्मीरी पंडितों के लिए जारी धमकी वाला यह लेटर फाल्कन स्क्वॉड के नाम से जारी किया गया, जिसमें लिखा है, ‘कश्मीरी पंडितों थोड़े फायदे के लिए बलि का बकरा मत बनो।
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तुम पहले ही देख चुके हो कि इस रास्ते पर चलने का अंजाम जान गंवाना होता है, जैसा राहुल पंडित, माखन लाल बिंदू, मोहन लाल और बाकी के साथ हुआ था। इन्हें भी हमने कई बार चेतावनी दी थी, लेकिन उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। तुम लोग उनकी तरह मत बनो। अपना नाम मरने वालों की लिस्ट में मत लिखवाओ।’
–लेख लोकमित्र गौतम के द्वारा