कश्मीरी पंडितों पर आगबबूला हुए फारूक अब्दुल्ला, बोले-घर जाओ, कोई नहीं रोक रहा

Farooq Abdullah Statement: जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों के घर वापसी के मुद्दे पर कहा कि किसी ने उन्हें रोक नहीं रखा ह। वे जब चाहें घर लौट सकते हैं।
Farooq Abdullah lashed out at Kashmiri Pandits, saying, Go home, no one is stopping you
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला। इमेज-सोशल मीडिया
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Farooq Abdullah News: जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने आज कश्मीरी पंडित पलायन दिवस पर कहा कि किसी ने उन्हें रोक नहीं रखा है। वे जब चाहें अपने घर लौट सकते हैं। घाटी में कई पंडित परिवार अब भी शांतिपूर्ण तरीके से अपने गांव में रह रहे हैं।

अब्दुल्ला ने खुद के कार्यकाल का जिक्र कर कहा कि उस समय उन्होंने पंडितों को घर बनाने का प्रस्ताव दिया था। बाद में सरकार बदल गई। अब यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वे इस दिशा में कदम उठाए। फारूक का कहना है कि पंडितों की वापसी में बाधा नहीं है। उन्हें बेझिझक लौटना चाहिए।

पुनर्वास जरूर होना चाहिए

जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस हमेशा से कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की पक्षधर रही है। पंडित समुदाय कश्मीर लौटना चाहता है तो उनका पुनर्वास जरूर होना चाहिए। उन्होंने कश्मीर की सुंदरता को पंडितों के बिना अधूरा बताया। उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जल्द फैसला लेगी। चौधरी ने कहा कि पंडितों को उनके मूल घरों में सुरक्षित तरीके से बसाने से घाटी की पुरानी सांस्कृतिक एकता फिर से मजबूत होगी।

आज है कश्मीरी पंडित पलायन दिवस

कश्मीरी पंडित पलायन दिवस 19 जनवरी को मनाया जाता है। यह इस समुदाय के लिए एक काला दिन की याद दिलाता है। 1990 में कश्मीर घाटी में उग्रवाद और धार्मिक कट्टरता चरम पर थी। 19 जनवरी की रात को मस्जिदों से लाउडस्पीकरों पर कश्मीरी हिंदुओं को धमकी दी गई कि वे इस्लाम अपनाएं, मारे जाएं या घाटी छोड़ दें। इस कारण हजारों परिवारों को भागना पड़ा। अनुमान के अनुसार 90 हजार से एक लाख तक पंडित परिवारों ने अपना घर छोड़ा। जो घाटी की कुल हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा था। इस दौरान चुनिंदा हत्याएं, महिलाओं से दुर्व्यवहार, लूटपाट और संपत्ति को आग लगाने जैसी घटनाएं हुईं। पंडित समुदाय की यह प्राचीन विरासत सदियों पुरानी थी। मगर, हिंसा ने सबकुछ तबाह कर दिया। अब भी कई परिवार जम्मू या देश के अन्य हिस्सों में निर्वासित जीवन जी रहे।

वापसी में चुनौतियां

कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की मांग लंबे समय से उठ रही। हालांकि, सुरक्षा और पुनर्वास की कमी से यह सपना अधूरा है। फारूक और चौधरी के बयानों से उम्मीद बंधती है। मगर, सुरक्षित आवास, रोजगार और सामाजिक एकीकरण की चुनौतियां हैं। घाटी में शांति बहाली से पंडितों का विश्वास जीता जा सकता है।

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