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संपादकीय: केंद्रीय मंत्री मांझी ने कमीशनखोरी स्वीकारी, मांझी के बयान से सियासी भूचाल
- Written By: अंकिता पटेल
MPLAD Fund Controversy: मांझी के सांसद-विधायक निधि से कमीशन लेने संबंधी बयान ने सियासी तूफान। विपक्ष ने इसे भ्रष्टाचार को खुला बढ़ावा बताते हुए सरकार की ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ नीति पर सवाल उठाए हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Navbharat Digital Desk: केंद्रीय सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगमंत्री जीतनराम मांझी सांसद, विधायक स्थानीय विकास निधि में से कमीशन लेते हैं। उन्होंने अपनी पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्यूलर) के सांसदों को भी सलाह दी कि वह 10 प्रतिशत नहीं तो कम से कम 5 प्रतिशत कमीशन अवश्य वसूल करें।
सांसद-विधायक इस रकम से गाड़ी खरीदें, पार्टी को भी पैसा दें। सांसदों को प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपये विकास निधि मिलती है। यदि 10 प्रतिशत कमीशन का हिसाब लगाएं तो यह रकम 40 लाख रुपये होती है।
एनडीए गठबंधन की केंद्र सरकार के मंत्री का यह कथन भ्रष्टाचार को खुला प्रोत्साहन देने वाला है। क्या यह सरकार के शीर्ष नेता के इस कथन को नहीं झुठलाता कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा। इस सांसद-विधायक निधि (एमपीलैंड) की शुरुआत 1993 में पीवी नरसिंहराव सरकार ने विकास के उद्देश्य से की थी।
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उसमें प्रत्येक चुनाव क्षेत्र के लिए 5 लाख रुपये स्थानीय विकास निधि देने का निर्णय लिया गया था। क्रमशः इस निधि को बढ़ाया जाता रहा। फिलहाल प्रत्येक सांसद को प्रतिवर्ष 5 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध कराई जाती है ताकि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र का विकास कर सके। इस निधि के लिए सांसद की चिट्ठी लेकर ठेकेदार जिलाधिकारी के पास जाता है।
एनडीए गठबंधन की केंद्र सरकार के मंत्री जीतनराम मांझी का कथन भ्रष्टाचार को खुला प्रोत्साहन देने वाला है। क्या यह सरकार के शीर्ष नेता के इस बयान को नहीं झुठलाता कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा।
ऐसा पत्र जारी करने के लिए ठेकेदार के लिए जरूरी हो जाता है कि वह सांसद को खुश करे। विकास निधि को मंजूरी देने के लिए सांसद या उसके निकटवर्ती कमीशन लेते हैं। इस तरह आरोप लगने पर प्रशासनिक सुधार आयोग ने सांसद निधि बंद करने की सिफारिश सरकार से की थी।
इस निधि के दुरुपयोग व भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कैग ने भी टिप्पणी की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय पीठ ने निर्णय दिया था कि सांसदों के लिए विकास निधि का प्रावधान करने में कुछ भी गलत नहीं है। विधायक निधि में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ने इसे रोक दिया था लेकिन फिर हल्ला-गुल्ला होने पर उन्होंने हर चुनाव क्षेत्र के लिए 4 करोड़ रुपये उपलब्ध करा दिए।
महाराष्ट्र में विधायक निधि के इस्तेमाल की आलोचना होती है। राज्य में 67 सांसद तथा 366 विधायक इस तरह कुल 433 जनप्रतिनिधियों को प्रत्येक 5 करोड़ के हिसाब से 2100 करोड़ रुपये से ज्यादा निधि प्रतिवर्ष उपलब्ध कराई जाती है। इस निधि से कितना काम होता है व कैसा विकास होता है, यह शोध का विषय है। हाल ही में राजस्थान में 3 विधायक स्थानीय विकास निधि में कमीशन लेते कैमरे में कैद हुए।
यह भी पढ़ें:- संपादकीय: ट्रेन किराया तो बढ़ा सुविधाएं भी बढ़ाएं, रेलवे ने बताई मजबूरी
इनके आचरण की जांच करने के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है। 2005 में प्रश्न पूछने के ऐवज में रकम लेने वाले 10 सांसद स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए थे, जिनकी सांसदी रद्द की गई थी। सांसद-विधायक निधि में भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच होनी चाहिए। विकास जरूरी है लेकिन उसमें ईमानदारी हो। जनता के पैसे की लूट रुकनी चाहिए।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Jitanram manjhi mplad fund commission statement controversy
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