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जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं में उत्साह, नागरिकों को अपनी चुनी हुई सरकार बनाने की चाह
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का चुनाव 10 वर्ष बाद होने जा रहा है। लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह और जोश है। उम्मीदवार घर-घर जाकर प्रचार कर रहे हैं। जनता हालात में बदलाव चाहती है, अमन और अपनी चुनी हुई सरकार चाहती है।
- Written By: मृणाल पाठक

(डिजाइन फोटो)
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का चुनाव 10 वर्ष बाद होने जा रहा है। लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह और जोश है। उम्मीदवार घर-घर जाकर प्रचार कर रहे हैं। जनता हालात में बदलाव चाहती है, अमन और अपनी चुनी हुई सरकार चाहती है। अवाम के इस विश्वास से कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए, उसे ईमानदारी से अपनी सरकार चुनने देनी चाहिए यानी ऊपर से उस पर कुछ थोपा न जाये, तब ही जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति की संभावनाएं बढ़ सकती है।
1987 में फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस की सरकार बनाने के लिए चुनावी नतीजों में धांधली की गई थी। लगभग सभी विपक्षी नेताओं को ‘अलगाववादी’ घोषित करके जेल में डाल दिया गया था। जिसका नतीजा यह निकला कि सरकार व अवाम के बीच फासला बढ़ गया और नवम्बर 1987 में आतंकवादियों की बंदूक से पहली गोली निकली जिसका सिलसिला कई दशक बाद भी जारी है।
अब देर रात तक प्रचार
इस बार मतदान (18 व 25 सितम्बर तथा 1 अक्टूबर को है। अब वह स्थिति नहीं है कि जब एक प्रत्याशी को जबरदस्त सुरक्षा उपलब्ध करानी पड़ती थी और वह फासले से वोटर्स को संबोधित करता था। अब तो प्रत्याशी मतदाताओं से हाथ मिला रहे हैं। अपने समर्थकों से गले मिल रहे हैं और घाटी के चुनावी क्षेत्रों में भी देर रात तक घर-घर जाकर अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं, जबकि यह क्षेत्र बंदूकों के साये में रहा करता था।
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पूर्व एमएलसी व श्रीनगर ईदगाह सीट से पीडीपी के उम्मीदवार खुर्शीद आलम कहते हैं, ‘‘पहले तो हम सूरज डूबने से पहले ही घर लौट आते थे। तब बहुत खतरा था। अब तो रात 12 बजे तक प्रचार का सिलसिला चलता है।’’ इस परिवर्तन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस बार किसी भी संगठन ने चुनाव के बायकाट की घोषणा नहीं की है। बायकाट की धमकी होती थी तो डर व्याप्त हो जाता था। बदला हुआ मूड वोटर्स की बातों से भी जाहिर हो रहा है।
जिन लोगों में पहले संकोच व डर था, अब वह खुलकर नेताओं का अपने घरों में स्वागत कर रहे हैं। प्रत्याशी पहले घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करने से डरते थे कि कहीं उन पर पथराव न हो जाये, क्योंकि आतंकी संगठन ही नहीं बल्कि हुर्रियत की तरफ से भी चुनाव बायकाट की घोषणा की जाती थी। अब लोग घर से बाहर निकल रहे हैं, अपने मुद्दे व परेशानियां सीधे प्रत्याशियों को बता रहे हैं।
भारी मतदान की उम्मीद
कश्मीर घाटी में घूमते हुए, लोगों के जोश को देखते व महसूस करते हुए ऐसा लगता है कि इस बार जबरदस्त मतदान होगा। पिछले लगभग 4 दशकों के दौरान तो मतदान केंद्रों पर मुश्किल से वोटर्स देखने को मिलते थे। परिवर्तन की यह लहर 2024 लोकसभा चुनाव में भी दिखायी देने लगी थी, जब श्रीनगर सीट पर 38।5 प्रतिशत मतदान हुआ था, जोकि 1987 के बाद सर्वाधिक था।
इस चुनाव का एक खास पहलू है- नये चेहरों की उपस्थिति। जम्मू-कश्मीर का 2019 में विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद पहली बार प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के समर्थन से 90 सीटों में से 7 पर आजाद उम्मीदवार मैदान में हैं। जमात-ए-इस्लामी का कहना है कि वह ‘चुनावी धांधली’ की वजह से चुनाव से अलग रहती थी। चूंकि जमात-ए-इस्लामी का कैडर चुनाव लड़ रहा है, इसलिए उस पर से प्रतिबंध हटाने की मांग तेज होती जा रही है।
कई नए उम्मीदवार
नये उम्मीदवारों में शामिल हैं एजाज अहमद गुरु, जोकि मुहम्मद अफजल गुरु के भाई हैं, जिन्हें 2013 में संसद पर हमला करने के आरोप में फांसी दी गई थी। एजाज सोपोर से आजाद उम्मीदवार हैं और अपने प्रचार अभियान में स्थानीय मुद्दे उठा रहे हैं जैसे बेरोजगारी व युवा पुनर्वास। वह सोपोर के विकास को प्राथमिकता देना चाहते हैं। नये चेहरों में बारामुला से सांसद अब्दुल राशिद शेख उर्फ इंजीनियर हैं राशिद की अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) के 19 प्रत्याशी भी हैं।
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राशिद को अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार करने के लिए हाल ही में अंतरिम जमानत मिली है। वह टेरर फंडिंग केस में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे। चूंकि बारामुला लोकसभा चुनाव में राशिद ने पूर्व मुख्यमंत्री व एनसी के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला को पराजित किया था, इसलिए घाटी में यह आरोप भी चल रहा है कि राशिद बीजेपी की ‘बी टीम’ हैं और उन्हें बीजेपी से अंदरूनी सांठगांठ के तहत चुनाव प्रचार के लिए जेल से बाहर निकाला गया है।
यह अनुमान इसलिए भी चल रहा है क्योंकि बीजेपी के टॉप नेताओं का अनुमान यह है कि जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस सहित कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी, क्योंकि 7 स्थानीय पार्टियां व आजाद उम्मीदवार मजबूत चुनावी स्थिति में हैं। जम्मू क्षेत्र में अपने दबदबे को कायम रखते हुए बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी और वह दूसरी बार जम्मू-कश्मीर में सरकार बना लेगी।
बीजेपी का कहना है कि उसका राशिद से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें अरविंद केजरीवाल की तरह ही अदालत ने अंतरिम जमानत दी है। इस पूरे विवाद पर राशिद की खामोशी ने रहस्य को अधिक गहरा दिया है, लेकिन इससे जम्मू-कश्मीर के अवाम में चुनावी उत्साह कम नहीं हुआ है, जो नतीजों के बाद भी कायम रह सकता है बशर्ते कि कोई खिलवाड़ न किया जाये।
लेख-नौशाब परवीन
Jammu and kashmir assembly elections 2024 voting
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