इंदौर (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: इंदौर के बाद गुजरात के गांधीनगर में भी पानी बीमारी बनकर सामने आया और यहां पर 150 से अधिक बच्चे और बड़े गंदा पानी पीकर बीमार होकर अस्पताल पहुंच गए। इस बुरी खबर ने जल जीवन मिशन और भूमिगत जल भंडार के जानकारों के लिए एक नया विषय खड़ा कर दिया है कि जल वितरण की कौन सी प्रणाली को अपनाएं जिससे दूषित पेयजल से बचा जा सके। भारत में अब स्वच्छता सर्वेक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए और इसे जमीन के ऊपर के साथ ही आसमान तथा धरती के भीतर भी लागू किया जाना चाहिए। इंदौर लगातार आठवीं बार देश में सफाई के मामले में पहले नंबर पर रहा है।
आखिर फिर क्या कारण रहा कि यहां की सीवेज व्यवस्था इसे संभाल नहीं पाई और बोरिंग के पानी में मल-मूत्र वाले अंश कैसे मिले? भारत के अधिकांश शहरी क्षेत्रों में आज भी सीवर की व्यवस्था नहीं है। यहां पर घरों का मल-मूत्र घरों के बाहर बने सीवेज टैंक में एकत्र होता है। देश के 57 प्रतिशत शहरी वार्डों की स्थिति यही है, खुले में सीवेज का पानी बहकर उन स्थानों पर एकत्र होता है जहां पर से पानी जानवर पीते हैं या फिर वह आगे जाकर किसी नदी में मिल जाता है। जब बारिश होती है, तो और जब पानी गली-सड़ी पाइप लाइनों से घरों में आता है तो यह जहर बनकर या तो इंदौर बनता है या फिर गुजरात का गांधीनगर। यह बात पूछी जा सकती है कि आखिर धरती के भीतर के स्वच्छता सर्वेक्षण से क्या मिलेगा?
इससे पता चलेगा कि जो भूजल नदियों के पानी से, वर्षा के जल से, शहरी कच्ची सीवरेज व्यवस्था से या दूसरे कारणों से बढ़ा या घटा है, वह कितना प्रदूषित है? विज्ञान कहता है कि बोरिंग और सेप्टिक टैंक के बीच कम से कम तीस मीटर की दूरी होनी चाहिए। तीस मीटर अर्थात सौ फीट। शहरों में मकानों-प्लैटों में तीस फीट का मानक कितना पूरा हो रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। बारिश न होने पर कृत्रिम बारिश जिसे क्लाउड सीडिंग कहा जा रहा है, वह भी धरती की सेहत को खराब कर रही है। कहा तो जाता है कि यह वायु प्रदूषण को कम करता है पर इससे जल प्रदूषण की समस्या बढ़ती है। सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायन धरती को क्षति पहुंचाते हैं, पोटैशियम आयोडाइड के साथ यह मिलकर आयोडिज्म पैदा करते हैं। धरती के भीतर के सर्वे से यह भी पता चलेगा कि डिटर्जेंट और दूसरे रसायनों से जो घुलनशील पदार्थ निकल रहे हैं, उन्होंने धरती को कितने भीतर तक प्रदूषित कर रखा है। कीटनाशक, रासायानिक खाद,माइक्रोबीड्स-माइक्रोफाइबर भी धरती के भीतर प्रदूषण ही कर रहे हैं। सबसे बेहतर उपाय यही है कि धरती की बाहरी सुंदरता के साथ ही धरती के भीतर की सेहत का भी ख्याल रखा जाए।
सीवेज का गंदा पानी बारिश के पानी के साथ मिलकर धरती के भूजल में चला जाता है और शासन-प्रशासन इस बात से प्रसन्न होता है कि भूजल का स्तर बढ़ रहा है। सीवरेज नहीं होने का सबसे बड़ा खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है, जिनके घरों में पानी को शुद्ध करने वाला आरओ नहीं है। ऐसे स्थान कम हैं, जहां पर पानी किसी डैम से लिया जाता है इंदौर में दूषित पेयजल की आपूर्ति से हुई मौतों के बाद चेता प्रशासन-शासन, किसी कार्रवाई को ठोस मुकाम पर पहुंचा पाता तब तक, उसके लिए एक बुरी खबर ने चिंताजनक स्थितियां पैदा कर दीं। यहां के भागीरथपुरा में नर्मदा के प्रदूषित जल के बाद अब बोरिंग का पानी भी दूषित मिला है, जो कोलिफार्म बैक्टीरिया से ग्रसित है।
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यह बैक्टीरिया मानव सेहत के लिए जहर का काम करता है। स्थानीय कलेक्टर शिवम वर्मा ने इसकी पुष्टि की तो यहां के प्रशासन के साथ ही उन सभी बोरिंग मालिकों के होश उड़ गए, जिन्होंने अपने घरों में बोरिंग करवा रखा है। बोरिंग के जो सैंपल लिए गए थे, उसमें से भी 35 सैंपल फेल हो गए हैं। उनमें भी यही विषाणु मिले हैं। स्पष्ट है कि इंदौर के लिए स्थिति खतरनाक हो गई है। यहां पर न तो नर्मदा का और न ही बोरिंग का पानी पीने योग्य बचा है।
लेख- मनोज वाष्णेय के द्वारा