Integrated Rocket Missile Force ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Integrated Rocket Missile Force: रकिट और मिसाइलों की व्यवस्था को एकीकृत कर एक कमांड के तहत लाना और फिर उसे मिलिट्री एआई के अंतर्गत ‘किल चेन’ का हिस्सा बनाना भविष्य के युद्ध में टिकने के लिए अपरिहार्य है, चीन ने बहुत पहले 2015 में ही ऐसे बल का गठन कर लिया था और मिलेट्री एआई अथवा ‘किल चेन’ के मामले में वह अमेरिका से जरा सा पीछे है।
चीन इस पर 350 हजार करोड़ युआन खर्चता है, तो अमेरिका फिलहाल 125 करोड़ डॉलर और हम महज 25 हजार करोड़ रुपये। चीन की रॉकेट और मिसाइल के एकीकृत कमांड पीएलएआर हमसे कई साल और तकनीकी स्तर पर बहुत आगे हैं। चीन के बाद पाकिस्तान भी पिछले साल मई से शुरू कर अब तक अपनी आर्मी रकिट फोर्स कमांड को खासा विकसित कर चुका है।
पाकिस्तान पश्चिम दिशा से आर्मी रॉकेट कमांड फोर्स के जरिए फतेह सीरीज की मिसाइलों और रकिटों से हमले कर सकता है, तो उत्तर से चीन अपनी हाइपरसोनिक मिसाइलों से भारत को नुकसान पहुंचा सकता है।
अगर दोनों देश मिलकर भारत पर हमला करते हैं, तो उनके रकिट मिसाइलों के आगे भारत की रक्षा प्रणाली संकट में आ सकती है। इसलिए भारत को रॉकेट-मिसाइल फोर्स की बहुत जरूरत है।
भारतीय सेना इस कमांड के गठन में अब और देर नहीं करेगी। वैसे भी इसका सुझाव 2021 में तत्कालीन सीडीएस विपिन रावत दे चुके थे। तीन साल के भीतर यह पूरी तरह सक्रिय होगा।
सेना इसके जरूरी ‘हार्डवेयर’ इकट्ठा कर चुकी है। ‘प्रलय’ मिसाइलों की दो नई यूनिट्स को मंजूरी मिल चुकी है और पिनाक रॉकेट सिस्टम की मारक क्षमता 300-450 किमी करने पर काम चल रहा है।
युद्ध के तौर तरीके बदलते जा रहे हैं, एआई समर्थित मिलिट्री एआई, रॉकेट मिसाइल इंट्रीग्रेटेड फोर्स, ड्रोन इत्यादि की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। पहले मिसाइलों का इस्तेमाल केवल बड़े हमले या परमाणु निवारण के लिए होता था, आज मैदान-ए-जंग में मिसाइलें केवल ‘विस्फोटक ले जाने वाले वाहन’ नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट और ऑटोनॉमस हंटर’ बन चुकी हैं। ये दूर बैठकर हमला करने यानी ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर’ का आधार हैं।
मिसाइलों की सटीकता इस कदर उन्नत हो चुकी है कि अब मिसाइलें पूरे शहर को तबाह करने के बजाय एक विशिष्ट खिड़की या मोबाइल लॉन्चर को निशाना बनाती हैं। भविष्य में एक साथ 50-100 छोटी मिसाइलें या ड्रोन छोड़े जा सकते हैं, जो आपस में ‘संवाद’ करेंगे। अगर एक मिसाइल नष्ट हो जाती है, तो दूसरी खुद-ब-खुद उसका लक्ष्य संभाल लेगी।
भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता को बढ़ाने और मौजूदा आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक रॉकेट और मिसाइलों को एक ही कमांड के तहत रखते हुए इसमें पिनाक मल्टी बैरल रकिट लॉन्चर, प्रलय टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल और ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, निर्भय जैसे सिस्टम एवं विशेष तरह के ड्रोन के अलावा मिसाइल और एयर डिफेंस हथियार इत्यादि भी शामिल कर रही है, तो यह उचित ही है।
यह विशेष रॉकेट-मिसाइल फोर्स अधिक तेजी से लंबी दूरी तक सटीक मार करने के साथ किफायती भी होगी। ये तीनों सेनाओं की संयुक्त फोर्स होगी जिसे चीन, पाकिस्तान सीमा पर तैनात किया जा सकता है।
इस एकीकृत बल बनने के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति बहुत मजबूत होगी। कमांड चेन छोटी होने से बेहतर तालमेल होगा तो त्वरित लक्ष्य भेदन संभव होगा। सेना अपनी सीमाओं के भीतर से ही पाकिस्तान या चीन के महत्वपूर्ण रसद केंद्रों और एयरबेसों को सटीक निशाना बनाने में सक्षम हो जाएगा।
‘नीड ऑफ द ऑवर’ समझे जाने वाले रॉकेट-मिसाइल फोर्स के एकीकृत कमांड का निर्माण हमारे रक्षा परिदृश्य को बदलकर रख देगा। इसमें मिसाइल, रॉकेट, ड्रोन और कुछ दूसरे हथियार और आक्रमणरोधी प्रणालियां भी शामिल होंगी।
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इस मामले में चीन हमसे बहुत आगे निकल चुका है, मगर एक साल पहले इसकी शुरुआत करने वाले पाकिस्तान को हम अगले दो वर्षों में पछाड़ देंगे। भारत का ‘एकीकृत रॉकेट बल’ यानी इंट्रीग्रेटेड रॉकेट फोर्स के निर्माण की योजना अब ठोस आकार लेने के करीब है।
–लेख संजय श्रीवास्तव के द्वारा