बाघों और तेंदुओं में गहराने लगा आनुवांशिकता संकट (सौ.सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पूरा जनमानस इस समय कुत्तों को लेकर दो गुटों में बंटा हुआ है। एक गुट इन्हें प्रश्रय देने के पक्ष में है, दूसरा चाहता है कि इन्हें मानव आबादी से दूर किया जाए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। लेकिन कुत्तों की चिंता में बाघ-तेंदुओं की अनदेखी एक नए संकट को जन्म दे रही है। यह संकट न सिर्फ प्रोजक्ट टाइगर को मात देगा बल्कि आने वाली पीढ़यों के सामने बाघ तेंदुओं की ऐसी दुनिया पेश करेगा, जिसे जानकर इंसान भी खुद चकित रह जायेगा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश में बाघ तेंदुओं के आतंक ने लोगों का जीवन हराम कर दिया है।
शहरी क्षेत्रों में रोज बाघ तेंदुओं के आने से सामान्य जीवन भी मुश्किल होता जा रहा है। मध्य प्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान भी टाइगर स्टेट का दर्जा पाने की ओर अग्रसर हैं। इसके साथ ही इन राज्यों में बाघ तेंदुओं ने जंगल को छोड़कर बस्तियों में डेरा डालना आरंभकर दिया है। चिंतनीय पहलू यह कि अब इन्होंने ट्रैपिंग पद्धति को भी धता बताना सीख लिया है। कई दिनों तक इन्हें ट्रैप करने के लिए लगाए गए पिंजड़े, शिकार के साथ लगे रह जाते हैं और ये या तो दूसरे स्थान पर शिकार कर लेते हैं या फिर वह मौका देखकर शिकार को ही ले उड़ते हैं।
वर्तमान में देश में 4000 के करीब बाघ तेंदुओं के होने की संभावना है। मध्य प्रदेश में इनकी संख्या सर्वाधिक 785 है तथा उसके बाद उत्तर प्रदेश और राजस्थान का नंबर आता है। जिस तरह से इन तीनों स्टेट में बाघों और तेंदुओं की संख्या बढ़ रही है, उससे अब इनकी प्रजातियों पर जीन पूल का खतरा मंडराना आरंभ हो गया है। जीन पूल का संकट का मतलब है किसी प्रजाति की आनुवांशिक विविधता का कम होना। यह समस्या हमारे यहां बाघों और तेंदुओं दोनो में ही गंभीर रूप से सामने आ रही है। ये छोटे छोटे आइसोलेटेड पापुलेशन में बंटे हुए हैं। जिस कारण ये बार बार आपस में ही प्रजनन प्रक्रिया (इनब्रीडिंग) दोहराते हैं, जिसके कारण इनसे पैदा होने वाले बच्चे न सिर्फ कमजोर जीन वाले हो रहे हैं बल्कि उनमें जन्म से ही कई किस्म की बीमारियां और कमजोर इम्यूनिटी की समस्या पैदा हो गई है।
इसे दूर करने का एक ही तरीका है कि टाइगर प्रोजेक्ट के तहज जो आसोलेटेड टाइगर रिजर्व हैं, उन्हें एक सुरक्षित कारीडोर के जरिये आपस में जोड़ दिया जाए और बाघ तेंदुओं की इस आबादी को साथी मिल जाएं। यदि बाघ तेंदुओं की लंबे समय तक अनदेखी हुई, तो यह न सिर्फ शहरों में रहने को मजबूर होंगे बल्कि इनकी स्वभाविकता भी खत्म हो जाएगी। इनकी स्वभाविकता में शामिल है जानवरों का शिकार, जंगलों में अपने परिवार के साथ अठखेलियां करना तथा अपनी शारीरिक सुंदरता को बरकरार रखते हुए प्रकृति के संतुलन की रक्षा करना।
देश में सिमटते जंगलों के कारण कई समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। माना जा रहा है कि भारत में इस सदी में करीब 25 से 28 हजार वर्ग किलोमीटर वन भूमि समाप्त हो गई है, जिससे जंगल न होने से जंगली जानवरों की कमी स्वभाविक है। इसमें नील गाय, हिरन, जंगली सुअर, भेड़एि, लोमड़ी के साथ ही दूसरे वे वन्यजीव भी हैं, जो बाघ तेंदुओं के लिए भोजन का काम करते हैं। चूंकि अब जंगल नहीं हैं तो हरी घास के मैदान या चारागाह नहीं होने से वन्यजीव प्रजनन घटता जा रहा है।
लेख- मनोज वार्ष्णेय के द्वारा