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नवभारत विशेष: हसीना का प्रत्यर्पण भारत पर बंधनकारी नहीं
Sheikh Hasina Extradition: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने मौत की सजा सुनाई। उन पर छात्र आंदोलन के दौरान वाले आरोप लगे
- Written By: दीपिका पाल

हसीना का प्रत्यर्पण भारत पर बंधनकारी नहीं (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने मौत की सजा सुनाई। उन पर आरोप था कि उन्होंने 2024 के छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए घातक हिंसा का प्रयोग किया, जिसमें सैंकड़ों लोगों की जानें गईं। हसीना ने ट्रिब्यूनल को ‘कंगारू कोर्ट’ कहते हुए कहा कि मुकदमा शुरू होने से पहले ही यह फैसला तय हो गया था। ट्रिब्यूनल को उनके राजनीतिक विरोधी नियंत्रित किए हुए हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने दिल्ली से आग्रह किया है कि 78 वर्षीय हसीना को वापस ढाका भेजा जाए। प्रबल संभावना यही है कि हसीना को ढाका को नहीं सौंपा जाएगा।
दिल्ली ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग प्राप्त होना तो स्वीकार किया है, लेकिन इस बारे में वह क्या करेगी, इसका कोई संकेत नहीं दिया है। भारत की पोजीशन में कोई बदलाव नहीं आया है। दिल्ली की ढाका के साथ जो 2013 की प्रत्यर्पण संधि है, वह भी हसीना को किसी भी राजनीतिक साजिश से सुरक्षाकवच प्रदान करती है। संधि का अनुच्छेद 9 कहता है कि अपराध अगर सियासी पहलू का है, तो प्रत्यर्पण से इंकार किया जा सकता है। हसीना का प्रत्यर्पण जटिल व लंबी प्रक्रिया है और मृत्युदंड ने इसकी जटिलता में अतिरिक्त इजाफा किया है। हसीना भारत की अच्छी दोस्त रही हैं, जिन्होंने न सिर्फ उसके आर्थिक व सुरक्षा हितों में सहयोग किया है बल्कि अतिवादी तत्वों को भी नियंत्रण में रखा था।
ऐसी दोस्त को जरूरत के समय अकेला छोड़ना भारत की साख के लिए अच्छा नहीं होगा। भारत के लिए यह भी चिंता का विषय है कि ढाका फिर से पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर करने के प्रयास में लगा हुआ है। बदले की भावना के चलते हसीना को कानूनी नाटक से सजा-ए-मौत दी गई है और ढाका अब दिल्ली के लिए मुख्य सुरक्षा चिंता है। हसीना ने 2010 में जिस ट्रिब्यूनल को स्थापित किया था पाकिस्तानी युद्ध अपराधियों व उनके बंगाली साथियों के ट्रायल के लिए (जिन पर बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नरसंहार का आरोप था) उसने ही अंतरिम सरकार के दबाव में उनके खिलाफ मौत की सजा सुनायी है। 1971 के दौरान 30 लाख लोगों की हत्या हुई थी व लगभग 2,50,000 महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ था। इनके दोषियों को सजा दिलाने की बांग्लादेश की सिविल सोसाइटी लंबे समय से मांग कर रही थी, जिसे स्वीकार करते हुए हसीना ने इस ट्रिब्यूनल की स्थापना की थी, जिसने जमात-ए-इस्लामी के अनेक युद्ध अपराधियों को मृत्युदंड दिया था। इसलिए इस ट्रिब्यूनल द्वारा हसीना को पिछले साल के छात्र आंदोलन में हुई मौतों के लिए मृत्युदंड देना कानूनन उचित प्रतीत नहीं होता है।
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साथ ही हसीना और उनके तत्कालीन गृहमंत्री असदुज्जमान खान पर 12 छात्र प्रदर्शनकारियों की मौत के भी आरोप थे।आईजी बन गए सरकारी गवाहः इस केस में मुख्य गवाह बांग्लादेश के पूर्व इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस हैं, जो हिरासत में हैं और सरकारी गवाह बन गए हैं। शेख मुजीबुर्रहमान का धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश मुस्लिम कट्टरपंथ के गड्ढे में गिरता नजर आ रहा है और हसीना उसके स्पष्ट निशाने पर हैं। आईएसआई के समर्थन से भारत-विरोधी तत्व बांग्लादेश में एकजुट हो रहे हैं जिसे हसीना रोके हुए थी। ढाका का वर्तमान शासन भारत की सुरक्षा चिंताओं को लेकर उदासीन है। पाकिस्तान पहले से ही निरंतर सुरक्षा खतरा है और इसमें बांग्लादेश का जुड़ जाना हमारी सुरक्षा एजेंसीज के काम को अतिरिक्त कठिन बना देता है। लेकिन समस्या स्वयं बांग्लादेश के लिए भी है। जिस तरह से बांग्लादेश के छात्र, धर्मनिरपेक्ष वर्ग व सिविल सोसाइटी मिलकर धार्मिक कट्टरपंथियों का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं उससे बांग्लादेश में गृह युद्ध की आशंका बढ़ती जा रही है।
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बदले की भावना से मौत की सजा
बदले की भावना के चलते हसीना को कानूनी नाटक से सजा-ए-मौत दी गई है और ढाका अब दिल्ली के लिए मुख्य सुरक्षा चिंता है। हसीना ने 2010 में जिस ट्रिब्यूनल को स्थापित किया था पाकिस्तानी युद्ध अपराधियों व उनके बंगाली साथियों के ट्रायल के लिए (जिन पर बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नरसंहार का आरोप था) उसने ही अंतरिम सरकार के दबाव में उनके खिलाफ मौत की सजा सुनायी है।
लेख- नरेंद्र शर्मा के द्वारा
Former bangladesh prime minister sheikh hasina was sentenced to death by the international crimes tribunal of bangladesh
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