निशानेबाज: वोटिंग में विवेक का करें इस्तेमाल, घोषणापत्रों में वादों का जाल

Election Promises India: क्यों नेताओं के आश्वासन बंधनकारी नहीं होते और क्यों विवेकपूर्ण मतदान ही लोकतंत्र की असली ताकत है। हवा-हवाई वादों को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है।
Election Update, Maharashtra
वोटिंग में विवेक का करें इस्तेमाल (सौ. डिजाइन फोटो)
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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज आप अध्ययनशील हैं, इसलिए हर पार्टी या गठबंधन के चुनाव घोषणापत्र का अवश्य ही बारीकी से अध्ययन करते होंगे। इससे आपका ज्ञान बढ़ता होगा कि हमारी पार्टियों को जनता की कितनी फिक्र है और वो कितना जनकल्याण करना चाहती हैं।' हमने कहा, 'चाहे चुनावी वचननामा हो या नेताओं के भाषण में दिए गए लुभावने आश्वासन, ये सब मौसमी बुखार की तरह हैं। भोले भाले लोग आंख मूंदकर इन बातों पर विश्वास कर लेते हैं। ऐसे हवा-हवाई वादों को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नेता सपनों के सौदागर होते हैं जिनका काम आकर्षक सपने दिखाने का है।

चुनाव के समय ये लोग जनता के आशिक बन जाते हैं, बाद में सारी प्यार-मोहब्बत भूल जाते हैं। उनके आश्वासन स्टैंप पेपर पर लिखे प्रॉमेसरी नोट नहीं रहते। चुनावी वादे का कोई कानूनी आधार नहीं होता। यह बंधनकारी नहीं होते। वचन देने में नेता कोई कंजूसी नहीं करता।' पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, नेताओं की दरियादिली पर इतना अविश्वास मत कीजिए। लोगों को भरोसा है तभी तो उत्साहपूर्वक वोट डालने जाते हैं और लाइन में खड़े होकर मतदान की अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं।' हमने कहा, 'चाहे चुनावी वचननामा हो या नेताओं के भाषण में दिए गए लुभावने आश्वासन, ये सब मौसमी बुखार की तरह हैं। भोले भाले लोग आंख मूंदकर इन बातों पर विश्वास कर लेते हैं।

ऐसे हवा-हवाई वादों को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नेता सपनों के सौदागर होते हैं जिनका काम आकर्षक सपने दिखाने का है। चुनाव के समय ये लोग जनता के आशिक बन जाते हैं, बाद में सारी प्यार-मोहब्बत भूल जाते हैं। उनके आश्वासन स्टैंप पेपर पर लिखे प्रॉमेसरी नोट नहीं रहते। चुनावी वादे का कोई कानूनी आधार नहीं होता। यह बंधनकारी नहीं होते। वचन देने में नेता कोई कंजूसी नहीं करता। पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, नेताओं की दरियादिली पर इतना अविश्वास मत कीजिए। लोगों को भरोसा है तभी तो उत्साहपूर्वक वोट डालने जाते हैं और लाइन में खड़े होकर मतदान की अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं।'

हमने कहा, 'उंगली पर अमिट स्याही तो लगा दी जाती है लेकिन चुनावी वादे अमिट नहीं होते। सत्ता पक्ष के नेता जब बड़े-बड़े आश्वासन देते हैं तो चादर देखकर पैर नहीं पसारते। सरकारी खजाने में इतने पैसे नहीं होते कि सारे खैराती वादे पूरे कर दिए जाएं, विपक्षी पार्टियों का मुख्य लक्ष्य सत्ता हासिल करना होता है इसलिए वह भी वादों की हवा भरकर रंगबिरंगा गुब्बारा फुलाती हैं। इसलिए सोच समझकर विवेकपूर्वक मतदान अवश्य कीजिए, यह आपका लोकतंत्र के प्रति कर्तव्य है। आजाद मुल्क के नागरिकों के लिए वोटिंग का अधिकार एक नियामत है। वोटर का मॅडेट या जनादेश ही तय करता है कि वह किसे सत्ता पर देखना चाहता है।

मतदान के दिन को छुट्टी मिलने, तफरीह करने में बिताने का इरादा बाद में कीजिए, पहले जल्दी से जल्दी जाकर वोट डालिए, अपनी मर्जी से मतदान करते समय किसी भी दवाव या प्रलोभन में हरगिज न आएं। नेताओं को परखने का यही सही अवसर है। जो वोट नहीं डालते, उन्हें बाद में शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है।'

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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