नवभारत विशेष: Cyber Security Awareness, बड़े ओहदे वाले ही क्यों होते हैं डिजिटल अरेस्ट
Cybercrime India: डिजिटल अरेस्ट व साइबर क्राइम एक ही ठगी के दो चेहरे हैं। डर व अधिकार का इस्तेमाल कर खासकर बुजुर्गों व आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: डिजिटल अरेस्ट और साइबर क्राइम दोनों एक ही धंधे के अंग हैं, बस अंतर सिर्फ इतना है कि डिजिटल अरेस्ट में शिकार प्रत्यक्ष डरता है और साइबर क्राइम आपके साथ कब हो जाएगा पता नहीं चलता। आप लाख चालाक होने के बाद भी साइबर क्रिमिनल्स या फ्रॉड के चक्कर में आ ही जाते हैं।
अमर सिंह चहल इसके ताजा उदाहरण हैं जो न सिर्फ कानून के रखवाले थे बल्कि न जाने उन्होंने कितने मामले ऐसे देखे होंगे, जिसमें जनसामान्य फंसकर उनके पास आए होंगे। आखिर डिजिटल अरेस्ट का फंदा उन लोगों पर क्यों गिरता है, जो या तो बुजुर्ग हैं अथवा जिनकी बड़ी धनराशि बैंकों, पोस्ट ऑफिस या कहीं दूसरी जगह जमा है, बड़े पदों से रिटायर हुए हैं, जिनकी उम्र वह है जिसमें डर सामान्य होता है? डिजिटल अरेस्ट ऐसे लोग नाममात्र को ही हुए होंगे, जिनके पास रोटी खाने मात्र की धनराशि होगी।
जिनके पास धन की बहुतायत नहीं है, वह डिजिटल स्कैमरों या फंदेबाजों के फंदे में बहुत कम फंस रहे। डिजिटल अरेस्ट किसके नाम पर हो रहे हैं? सीबीआई, पुलिस, संचार सेवा, ईडी, बैंक, आयकर, जीएसटी, हाउसिंग सोसायटी तथा कस्टम अधिकारी, ऐसे नाम हैं जिनके नाम से हर किसी की हिम्मत टूट जाती है और वह कहां चक्कर में फंस गया या अब क्या होगा सोचते हुए उनसे छुटकारा पाने की सोचता है।
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भारत में वर्ष 2024 में 1.25 लाख से अधिक लोग करीब 2,140 करोड़ की ठगी का शिकार इसी माध्यम से हुए। 2025 के आरंभिक दो माह में ही करीब 211 करोड़ रुपये ठगे जा चुके थे। गत एक दशक में देश में बैंको ने 65 हजार से अधिक 4।69 लाख करोड़ रुपये की ठगी की सूचना दी थी।
रिजर्व बैंक तो देश में वर्ष 2023 में तीस हजार करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की बात कहता है। इससे बचने के लिए क्या करें साइबर विशेषज्ञ मानते हैं कि आम जनता आज भी इनकम टैक्स या फिर मोबाइल सिम से हुए अपराध के नाम से डरती है। वह पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाने से इतना डरती है कि डिजिटल फंदेबाजों पर विश्वास करके अपनी हिम्मत गंवा देती है और फिर खाते की रकम बिना किसी को बताए, उनके लेंगे? हवाले कर देती है।
आईएएस, आईपीएस, जज, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक यहां तक कई कि बार कस्टम और संचार विभाग के अफसर भी फर्जी गिरफ्तारी में आ जाते हैं। इस डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए क्या किया जाए? जब सरकार और उसके विभाग बताते हैं कोई भी विभाग डिजिटल अरेस्ट नहीं करता, तो फिर भी जनता उन पर विश्वास क्यों नहीं करती? यदि जनता का विश्वास जीतना है, तो सरकारी नियमों को इतना लचीला बनाना होगा कि आम जनता उनके सामने जाकर अपनी बात रख सके।
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सोशल मीडिया को तो रोकना ही होगा, जिसमें रोज कहा जाता है कि आपकी सिम जांचिए कहीं वह अपराधियों के कब्जे में तो नहीं या एयरपोर्ट पर कितना सोना ले जा सकते हैं, बैंक एफडी तो कहीं साइबर अपराधियों के निशाने पर तो नहीं? आज बैंकों की गुप्त जानकारी, मोबाइल नंबर, व्यक्तिगत खरीद-बेचने की सूचनाएं नाममात्र के पैसे देकर आसानी से मिल जाती हैं। जब यह अत्यधिक संवेदनशील जानकारी मार्केट में आसानी से उपलब्ध है, तो डिजिटल फंदेबाज क्यों नहीं अपना शिकार आसानी से तलाश लेंगे।
साइबर क्राइम के बढ़ते मामले
पंजाब के पूर्व आईजी अमर सिंह चहल द्वारा साइबर ठगी में आठ करोड़ से अधिक की धनराशि गंवा देने के बाद आत्महत्या के प्रयास की खबर ने न सिर्फ सभी को चौंकाया बल्कि देश की कानून बनाने वाली संस्थाओं पर भी एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
इस सदी में सबसे बड़ा दर्द बनकर उभरा है डिजिटल अरेस्ट, जो साइबर क्राइम का एक महत्वपूर्ण और सर्वाधिक दहशत पैदा करने वाला हिस्सा है। इस साइबर अरेस्ट में शिकार अपने जीवन की कमाई गंवा देता है। अमर सिंह चहल प्रकरण एक उदाहरण मात्र है और देश में अब तक हुए साइबर क्राइम के मामलों में संभवतः सबसे बड़ों में से एक।
लेख- मनोज वाष्र्णेय के द्वारा
