प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Digital Fraud in India: डिजिटल व्यवस्था की आत्मा ‘विश्वास’ है, जब कोई नागरिक क्यूआर कोड स्कैन करता है, तो वह केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि उस संपूर्ण तंत्र पर भरोसा करता है, जो उसे सुरक्षा का आश्वासन देता है। किंतु जब यह विश्वास फिशिंग, फर्जी कॉल और निवेश घोटालों के कारण टूटने लगता है, तो डिजिटल विकास की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ जाती है।
जिस प्रकार नकली नोटों की भरमार मुद्रा पर से विश्वास कम कर देती है, उसी प्रकार ऑनलाइन ठगी की अधिकता नागरिकों को डिजिटल माध्यमों से दूर कर सकती है। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है। परंपरागत और डिजिटल अपराधों के स्वरूप में जमीन-आसमान का अंतर है।
पहले चोरी या डकैती एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित होती थी और अपराधी की पहचान अपेक्षाकृत आसान थी। इसके विपरीत डिजिटल अपराधी ‘अदृश्य’ है। वह दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर सैकड़ों लोगों को एक साथ निशाना बना सकता है।
पारंपरिक अपराधों में अपराधी के लिए जोखिम अधिक और लाभ कम था, जबकि डिजिटल जगत में जोखिम न्यूनतम और लाभ असीमित है। यही असंतुलन इसे और अधिक खतरनाक बनाता है।
डिजिटल अपराधों में पीड़ित की मानसिक स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। अक्सर पुलिस और साइबर सेल द्वारा तकनीकी कारणों का हवाला देकर पीड़ित को लौटा दिया जाता है, जिससे व्यवस्था के प्रति अविश्वास जन्म लेता है। साइबर अपराधों में शुरुआती ‘गोल्डन आवर’ (घटना के तुरंत बाद का समय) सबसे महत्वपूर्ण होता है।
यदि इस दौरान बैंक खाते फ्रीज करने या ट्रांजैक्शन ट्रैक करने की त्वरित व्यवस्था न हो, तो रिकवरी लगभग असंभव हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऑनलाइन धोखाधड़ी को व्यक्तिगत अपराध के बजाय ‘संगठित आर्थिक आक्रमण’ के रूप में देखने का संकेत दिया है। नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन के बीच की खाई अभी भी एक बड़ी बाधा है।
कई हेल्पलाइन और प्लेटफॉर्म तो बने हैं, लेकिन उनमें त्वरित प्रतिक्रिया और उत्तरदायित्व की कमी स्पष्ट झलकती है। डिजिटल धोखाधड़ी का बढ़ता ग्राफ सरकार की ‘कैशलेस इकोनॉमी’ की नीति को भी प्रभावित करता है। यदि लोगों में असुरक्षा का भाव घर कर गया, तो वे पुनः नकद लेन-देन की ओर लौट सकते हैं। इसके अतिरिक्त, विदेशी निवेशकों के लिए भी यह एक नकारात्मक संकेत है कि भारत का साइबर सुरक्षा ढांचा पर्याप्त सुदृढ़ नहीं है।
अतः यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि आर्थिक नीति का भी एक अनिवार्य प्रश्न है। विकसित देशों ने साइबर सुरक्षा को अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हिस्सा बनाया है। भारत को भी इसी दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। स्थानीय पुलिस को केवल पारंपरिक प्रशिक्षण के बजाय डिजिटल फॉरसिक, ब्लॉकचेन ट्रैकिंग और डाटा विश्लेषण में विशेषज्ञ बनाना होगा।
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बैंकों और भुगतान प्लेटफॉमों की केवाईसी (KYC) प्रक्रिया को और अधिक कठोर बनाना अनिवार्य है ताकि फर्जी पहचान पर खाते न खुल सकें, यदि आंतरिक मिलीभगत पाई जाती है, तो संस्थाओं पर भारी दंड लगाया जाना चाहिए, स्कूलों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से डिजिटल साक्षरता अभियान चलाने की आवश्यकता है।
हालांकि, जागरूकता का पूरा बोझ नागरिकों पर डालकर तंत्र अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। सुरक्षा का प्राथमिक दायित्व तंत्र का ही है। डिजिटल क्रांति का मूल उद्देश्य सुविधा और समृद्धि है। यदि यह क्रांति भय और असुरक्षा का कारण बनने लगे, तो इसका नैतिक आधार कमजोर हो जाएगा। भारत जैसे विशाल देश में डिजिटल परिवर्तन को रोकना न तो संभव है और न ही उचित।
आवश्यकता है एक ऐसी समन्वित रणनीति की जहां नीति, तकनीक और प्रशासन मिलकर काम करें। डिजिटल भारत की वास्तविक सफलता केवल एप्स और डाटा के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस सुरक्षा और विश्वास से मापी जाएगी, जो नागरिक हर ट्रांजैक्शन करते समय महसूस करता है।
डिजिटल क्रांति ने भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को एक अभूतपूर्व गति प्रदान की है। यूपीआई (UPI), मोबाइल बैंकिंग और ई-कॉमर्स ने लेन-देन को न केवल सरल और त्वरित बनाया है, बल्कि पारदर्शिता की एक नई मिसाल पेश की है। आज एक सामान्य नागरिक भी कुछ ही सेकंड में देश के किसी भी कोने में धन भेज सकता है।
यही कारण है कि इस क्रांति को ‘नए भारत’ और ‘विकसित भारत’ की आधारशिला माना जा रहा है। किंतु इसी चमक के पीछे ‘साइबर लूट’ की एक भयावह विडंबना भी छिपी है, जो देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर प्रश्नचिह्न बन गई है।
-लेख ललित गर्ग के द्वारा