नवभारत विशेष: क्लाउड सीडिंग कहीं बिगाड़ न दे इकोसिस्टम, दिल्ली में कृत्रिम वर्षा की तैयारी
Delhi Cloud Seeding: दिल्ली सरकार ने क्लाउड सीडिंग की तैयारी शुरू कर दी है। IIT कानपुर को जिम्मेदारी सौंपी गई। योजना का उद्देश्य सूखे व वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों से निपटने के विकल्प तैयार करना है।
- Written By: अंकिता पटेल
दिल्ली, क्लाउड सीडिंग, (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Artificial Rain Technology India: अभी मानसून का सीजन आरंभ ही हुआ है, लेकिन दिल्ली सरकार अभी से क्लाउड सीडिंग की तैयारी में लग गई है। हालांकि उसने अभी इसके परीक्षण की तारीख घोषित नहीं की है, पर तैयारी आरंभ कर दी गई है। वर्ष 2025 में दिल्ली में दो बार क्लाउड सीडिंग की कोशिश हुई थी, लेकिन वह दोनों ही बार सफल नहीं हो सकी थी। कानपुर आईआईटी को जिम्मा दिया है। उसका मुख्य उद्देश्य यह है कि जब भी क्लाउड सीडिंग हो तो वह सफल हो।
इसके लिए उड़ानों के शेड्यूल से लेकर मौसम विभाग तक से वह संपर्क में है। इससे साफ होता है कि दिल्ली सरकार ने तय कर लिया है कि वह वर्ष 2026 में कभी भी सूखा या वायु प्रदूषण से निपटने के लिए क्लाउड सीडिंग करा सकती है।
अगर यहां पर भविष्य मे होने वाली क्लाउड सीडिंग सफल हो जाती है, तो देश के दूसरे प्रदेश जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं या फिर वायु प्रदूषण पर रोक लगा पाने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहे हैं, वह इसका सहारा लेंगे। लेकिन अगर यह क्लाउड सीडिंग चलन में आ जाती है, तो यह देश के इकोसिस्टम को तो बिगाड़ेगी ही, साथ ही इंसानी सेहत को भी व्यापक तरीके से प्रभावित करेगी।
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पर्यावरणीय जोखिम और जरूरत पर उठे सवाल
इस समय देश के पर्यावरण का पूरा इकोसिस्टम बिगड़ चुका है, इसके कारण थोड़े-थोड़े समय पर नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं और स्थिति यह हो गई है कि सर्दी, गर्मी तथा वर्षा अपनी सीमाएं तोड़ रही हैं। जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम चक्र हद तक खराब हो चुका है तो आखिर क्यों क्लाउड सीडिंग कराना चाहती है सरकार? अगर पर्यावरणविद् तथा चिकित्सा जगत की बात मान ली जाए तो प्रकृति के खिलाफ, उसे नीचा दिखाने के लिए क्लाउड सीडिंग पर उतारू अफसर, भारत में भविष्य में कई तरह की नई बीमारियों के लिए नए रास्ते तो खोल रहे हैं, साथ ही धरती के प्रदूषण को बढ़ाने में भी सहयोग ही करेंगे।
इसी साल मार्च माह में जारी दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण में यह शामिल है कि मौसम विभाग की राय से दिल्ली में अधिक कृत्रिम वर्षा के ट्रायल किए जाएं। इसे कराने का उद्देश्य हवा में जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कण हैं उन्हें खत्म करना है। यूएई तथा चीन में क्लाउड सीडिंग आम है।
क्लाउड सीडिंग पर बहस
ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्पेन और अमेरिका में भी यह जब तब कराई गई है। दुबई में तो जब यह हुई तो इसे वहां आई बाढ़ का एक कारण माना गया था। विशेषज्ञों ने कहा था कि इसने वहां के बादलों में जो नमी थी उसे बढ़ा दिया, जिससे बाढ़ की स्थितियां बनीं। भारत में पर्यावरण प्रदूषण जनित कई बीमारियां पहले ही से प्रचलित हैं और जब आसमान से कृत्रिम वर्षा कराई जाती है तो सिल्वर आयोडाइड तथा सोडियम क्लोराइड का प्रयोग किया जाता है।
ये दोनों बादलों की ठंडी-गर्म प्रकृति के आधार पर इस्तेमाल में लाए जाते हैं। जब यह आसमान से धरती पर आते हैं, तो इनके साथ वह कण भी मिल जाते हैं, जो पहले से वायु मंडल में छाए रहते हैं। इससे इस बात की संभावना अधिक हो जाती है कि यह मानव के शरीर पर गिरने के बाद उसे क्षति पहुंचा सकते हैं। नदियों में रहने वाली मछलियों, कछुओं या फिर धरती में अंदर तक समाए केंचुओं के लिए यह टॉक्सिक हो जाते हैं। अगर यह रसायन हमारी फसलों में समा जाए तो यह हमारे पेट में सीधे जाकर वहां पर कई बीमारियां अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं।
दिल्ली में कृत्रिम वर्षा की तैयारी
अगर पानी पीने की समय सीमा लंबे काल तक हो तो फिर पेट की बीमारी अर्जाड़रिया का खतरा बढ़ जाता है। इससे हमारी त्वचा तो नीली जैसी हो जाती है और जीवनभर यह सही नहीं होती। यह खतरनाक भले ही न हो पर समाज में इस तरह के रंग को लेकर जीना किसी शर्मनाक स्थिति से कम नहीं है।
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वैसे इसके कारण सांस लेने में परेशानी होना भी सामने आया है, पर अभी यह सभी प्रारंभिक प्रक्रिया में हैं और इन पर रिसर्च जारी है। लेकिन जब हमारे शरीर पर पर्यावरण प्रदूषण के कारण पहले से ही कई बीमारियां अपना असर छोड़ रही हैं। तब क्या क्लाउड सीडिंग ही वर्षा कराने का एकमात्र उपाय है? इसे कराने की योजना बनाने से पहले इस बात पर विचार किया जाए कि हमारा इकोसिस्टम कैसे ठीक हो ?
लेख-मनोज वार्ष्णेय के द्वारा
