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संपादकीय: केंद्र नहीं चाहता राष्ट्रपति-राज्यपाल पर बंधन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं
Central Government on Supreme Court: केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से बिल्कुल सहमत नहीं है कि राष्ट्रपति व राज्यपाल पर किसी विधेयक पर फैसला लेने के लिए समय सीमा का बंधन लाया जाए।
- Written By: दीपिका पाल

केंद्र नहीं चाहता राष्ट्रपति-राज्यपाल पर बंधन (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से बिल्कुल सहमत नहीं है कि राष्ट्रपति व राज्यपाल पर किसी विधेयक पर फैसला लेने के लिए समय सीमा का बंधन लाया जाए।इस मुद्दे पर टकराव का रुख अपनाते हुए केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि यदि राष्ट्रपति व राज्यपाल पर ऐसी बंदिश लागू की गई तो उसके गंभीर परिणाम होंगे और संवैधानिक संकट पैदा हो जाएगा।तमिलनाडु की डीएमके सरकार व राज्यपाल आरएन रवि का विवाद इस संघर्ष के मूल में है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा की गई न्याय व्यवस्था की आलोचना तथा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पूछे गए 14 प्रश्नों को लेकर यह मुद्दा गरमाया है।अब सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार करेगा।तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयक राज्यपाल रवि ने रोक रखे हैं जिसके विरोध में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।तब न्यायमूर्ति बीएम पारदीवाला व न्या।आर महादेवन की पीठ ने विधेयक पर निर्णय लेने के लिए राज्यपाल को 1 माह तथा राष्ट्रपति को 3 माह की मोहलत देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया।केंद्र ने राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए समय सीमा तय करने के सुप्रीम कोर्ट के अधिकार पर आपत्ति जताई।केंद्र का मत है कि एक घटक की गलती से दूसरे घटक को अधिकार नहीं मिल जाता।ऐसा करने से संवैधानिक संभ्रम उत्पन्न होगा।राज्यपाल या राष्ट्रपति के विवेक पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।
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समयावधि बीतने के बाद अपने आप विधेयक को सम्मति मिल जाने की कल्पना निर्माण करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया है।यदि किसी विषय पर संविधान का प्रावधान अस्पष्ट है तो अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को मिलता है।विधेयक को मंजूरी देने के लिए किसी भी समय सीमा का स्पष्ट उल्लेख संविधान में नहीं है।केंद्र सरकार ने अपने शपथ पत्र में जो मुद्दे पेश किए हैं उन पर न्यायालय में बहस हो सकती है।लोकतंत्र में जनता द्वारा निर्वाचित सरकार अधिकार संपन्न है तथा मंत्रिमंडल की सलाह से राज्यपाल और राष्ट्रपति निर्णय लेते हैं।राष्ट्रपति व राज्यपाल दोनों ही पद संवैधानिक हैं।उनकी कोई त्रुटि राजनीतिक व संवैधानिक व्यवस्था से दूर की जानी चाहिए।
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यदि केंद्र का ऐसा तर्क है तो उसने यह त्रुटि दूर क्यों नहीं की? विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल तक अटकाए रखने के राज्यपाल के रवैये को कैसे उचित माना जाए? इस संबंध में केंद्र क्यों मौन साधे हुए है? यदि संविधान के प्रावधान में कोई अस्पष्टता या त्रुटि है तो उसका निवारण होना चाहिए।राज्यपाल यदि विपक्षी दल द्वारा चलाई जा रही राज्य सरकार के विधेयक बगैर निर्णय लिए लंबे समय तक रोके रहते हैं तो उसका कोई तो समाधान होना चाहिए।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Centre does not want any restrictions on the president and governor
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