नवभारत विशेष: सीएपीएफ विधेयक को लेकर उठा विवाद, उच्च पद IPS अधिकारियों को दिए जाएंगे

CAPF Bill Controversy: सीएपीएफ विधेयक 2026 संसद में पारित हो गया है, जिसमें उच्च पदों पर आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। विपक्ष और पूर्व अधिकारियों ने इसे लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।
Navbharat Special: Controversy Erupts Over CAPF Bill; Higher Posts to be Allotted to IPS Officers
IPS Deputation CAPF Debate( Source: Social Media )
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IPS Deputation CAPF Debate: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 (सीएपीएफ विधेयक) को 2 अप्रैल को संसद के दोनों सदनों ने ध्वनि मत से पारित कर दिया। इस विवादित विधेयक में कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में इंस्पेक्टर जनरल की रैंक के कुल 50 प्रतिशत पद, अतिरिक्त महानिदेशक (एडिशनल डायरेक्टर जनरल) रैंक के कम से कम 67 प्रतिशत पद और विशेष महानिदेशक (स्पेशल डायरेक्टर जनरल) व महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) की रैंक के 100 प्रतिशत पद भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के उन अधिकारियों से भरे जाएंगे, जो प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर है।

विपक्ष के नेताओं व अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों ने इस विधेयक की आलोचना की है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक पर केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा है कि अर्द्धसैनिक बल पर नियंत्रण के लिए किसी को भी ऊपर नहीं बैठाया जा सकता।

आज तक भारत में किसी भी अर्द्धसैनिक बल का नेतृत्व ऐसे अधिकारी ने नहीं किया है, जो अपने ही अर्द्धसैनिक बलों में निचले पदों से ऊपर उठा हो। राहुल गांधी के अनुसार यह विधेयक हमारे सुरक्षा जवानों के लिए अन्यायपूर्ण है, जिसे अपनी सरकार बनने पर वह निरस्त करने को कह रहे हैं। यह विधेयक सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के प्रबंधन, भर्ती और सेवा शतों को विनियमित करता है।

सरकार का तर्क है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में डेढ़ से दो साल का वक्त लग जाता था, जो कि अब 11 महीने में पूरी हो जाएगी। सवाल यह है कि यह विधेयक क्यों लाया गया? न्यायाधीश ए. एस. ओका व न्यायाधीश उज्वल भुयन की सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने 23 मई 2025 को आदेश दिया था कि वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड में आईपीएस अधिकारियों के जो प्रतिनियुक्ति पद हैं या सीएपीएफ में जो महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल) तक की रैंक के जो पद हैं उन्हें 'समय के साथ निरंतरता के साथ कम कर देने चाहिए, इस आदेश के विरोध में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दाखिल की, जिसे 28 अक्टूबर 2025 को निरस्त कर दिया गया।

इस निर्णय के बावजूद गृह मंत्रालय आईपीएस अधिकारियों को सीएपीएफ में इंस्पेक्टर जनरल व डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के पदों पर नियुक्त करता रहा। इसलिए अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों ने गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ अदालत की अवमानना करने की याचिका दायर की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू नहीं किया जा रहा है।

फिर 10 मार्च 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सीएपीएफ विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी। सवाल यह है कि सीएपीएफ क्या है? सीएपीएफ में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) है, जो पाकिस्तान व बांग्लादेश की सीमाओं पर तैनात है, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) है, जो एयरपोर्ट्स व महत्वपूर्ण संयंत्रों की सुरक्षा करता है, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) है जिसे आंतरिक सुरक्षा आदि, क़ानून व्यवस्था जिम्मेदारियों व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया जाता है, सशख सीमा बल (एसएसबी) नेपाल व भूटान से लगी सीमाओं की सुरक्षा करता है और इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) है जो चीन से लगी सीमा पर तैनात की गई है।

वर्तमान में, एक एग्जीक्यूटिव आदेश के माध्यम से सीएपीएफ में 20 प्रतिशत पद डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल रैंक के और 50 प्रतिशत पद इंस्पेक्टर जनरल के आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। सीएपीएफ में लगभग 13,000 ग्रुप ए अधिकारी हैं और तकरीबन दस लाख जवान हैं। गृह मंत्रालय सीएपीएफ और आईपीएस का कैडर को नियंत्रित करने वाला प्राधिकरण है।

समझना जरूरी है कि विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है? अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अर्थहीन बनाने के लिए पारित किया गया है। उनका तर्क है कि जो अधिकारी सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट की रैंक पर जॉइन करता है, उसे 16 वर्ष की सेवा के बाद भी पदोन्नति नहीं मिलती।

उच्च पद IPS अधिकारियों को दिए जाएंगे

ऐसा प्रतीत नहीं होता कि संसद के दोनों सदनों में पारित सीएपीएफ विधेयक को सरकार वापस लेगी। इसलिए अनुमान है कि अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारी अपने कानूनी संघर्ष को जारी रखते हुए इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

एक अधिकारी के लिए यह अपमानजनक है कि रैंक में उससे जूनियर या समकक्ष अधिकारी को उसका सीनियर बना दिया जाए और वह उससे ऑर्डर ले। इसलिए सरकार को सीएपीएफ विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए।

लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा

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