प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नाटो सोवियत विस्तारवाद के खतरे से निपटने के लिए बना था। उद्देश्य यह था कि यूरोप और अमेरिका मिलकर एक सामूहिक सुरक्षा छाता तैयार करें। इसका मूल मंत्र इसके संविधान का अनुच्छेद 5 है, जिसका मूल कथ्य है, ‘एक सदस्य पर हमला, सब पर हमला’। यह भरोसे का वाक्य है। इसी भरोसे ने यूरोप में दशकों तक युद्ध की आग को भड़कने से बचाए रखा।
लेकिन अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति ट्रंप का नजरिया हमेशा ‘लेन-देन’ रहा है। वह सुरक्षा को भी बिजनेस डील की तरह देखते हैं। 2025 में भी उनकी मांग रही कि नाटो सदस्य रक्षा खर्च को 2% से बढ़ाकर अपने जीडीपी का 5% करें। ट्रंप की भाषा ‘कंडीशनल सब्सक्रिप्शन’ जैसी हो गई। पैसा दोगे तो सुरक्षा, नहीं तो नहीं।
ट्रंप की इस सोच ने सवाल पैदा कर दिया है कि क्या वह नाटो को ‘खत्म’ कर सकते हैं? इस सवाल का जवाब दो हिस्सों में है, औपचारिक रूप से नाटो को ‘तोड़ना’ शायद मुश्किल है। क्योंकि नाटो एक संधि, संस्थान, सैन्य कमान, इंटेलिजेंस नेटवर्क, संयुक्त अभ्यास इन सबका मिला-जुला विशाल ढांचा है। इसे एक झटके में खत्म कर देना आसान नहीं होगा। लेकिन ‘खोखला’ करना आसान है।
पिछले कुछ हफ्तों में डोनाल्ड ट्रंप ने जिस भाषा में नाटो सहयोगियों से बात की है, साथ ही जिस तरह से उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर ‘पीछे न हटने’ तथा ताकत के इस्तेमाल की धमकी दी है, उससे एक बुनियादी डर पैदा हो गया है कि क्या 21वीं सदी की दुनिया, नियमों से चलने वाली रहेगी या फिर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ होगी। यह सवाल अंतरराष्ट्रीय कानून, गठबंधनों की विश्वसनीयता, छोटे देशों की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार से जुड़ा हुआ है। आजकल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, विशेषकर ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और यूरोप के लिए, उससे यह बुनियादी सवाल पैदा होता है कि आखिर नाटो क्यों बना था ? साथ ही यह भी कि क्या ट्रंप नाटो की जरूरत को खारिज कर रहे हैं?
यदि अमेरिका की प्रतिबद्धता संदिग्ध हो जाए, तो नाटो की विश्वसनीयता धीरे-धीरे गिर जाएगी। सवाल यह है कि ग्रीनलैंड पर अगर ट्रंप ‘ताकत’ से कब्जा कर लेते हैं तो क्या होगा? ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। डेनमार्क नाटो का सदस्य है। इसलिए ऐसा करने पर नाटो के यूरोपीय सहयोगियों में भारी चिंता और नाराजगी पैदा होगी तथा इसके परिणाम बहुस्तरीय होंगे।
इससे नाटो के अंदर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। अमेरिका का यह कदम इस मायने में भी अभूतपूर्व होगा कि एक नाटो देश दूसरे नाटो देश के इलाके पर कब्जा करे। इससे नाटो का केंद्रीय विचार ही खत्म हो जाएगा, क्योंकि नाटो बाहरी दुश्मन से सुरक्षा के लिए है, अंदरूनी शक्ति-प्रयोग के लिए नहीं। यूरोपीय संघ ऐसी स्थिति में कड़े प्रतिरोधी कदम (टैरिफ आदि) के साथ-साथ जोर-जबरदस्ती वाले उपायों पर भी जा सकता है।
मतलब कि यह सिर्फ सैनिक संकट नहीं, व्यापार युद्ध भी बन सकता है। रूस और चीन द्वारा इस तनाव को भुनाने की कोशिश भी हो सकती है। विशेषकर चीन ऐसे मौके पर यही निष्कर्ष निकालेगा कि जब पश्चिम खुद नियम तोड़ सकता है, तो वह क्यों नहीं? ऐसी स्थिति में एक सवाल यह भी पैदा हो सकता है कि क्या इसके बाद भी ‘विश्व व्यवस्था’ कायम रह सकती है? अगर ग्रीनलैंड जैसे मामले में ‘दबाव या ताकत’ का इस्तेमाल सफल होता है, तो यह दुनिया भर के शक्तिशाली देशों के लिए मनमर्जी करना आसान हो जाएगा और फिर व्यवस्था ‘नियमों’ से नहीं, डर, हथियार और धमकी से चलेगी।
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यूरोप रक्षा खर्च तेज करेगा। फ्रांस/जर्मनी जैसे देश नाटो के समानांतर यूरोपीय सुरक्षा ढांचे पर जोर देंगे जबकि भारत के लिए यह स्थिति ‘अवसर तथा जोखिम’ दोनों लाएगी। अवसर यह होगा कि यूरोप भारत को ज्यादा महत्वपूर्ण साझेदार मानेगा, जोखिम यह होगी कि अगर पश्चिमी एकता कमजोर हुई तो वैश्विक व्यापार और सुरक्षा अनिश्चित होगी, जिसका असर ऊर्जा कीमतों, सप्लाई चेन और निवेश पर पड़ेगा।
लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा