निशानेबाज: संघ शाखा में केवल संस्कार इनकमिंग से BJP का विस्तार
BJP RSS Strategy: आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं और बाहरी नेताओं की एंट्री को लेकर बीजेपी में मंथन तेज है, जहां सिद्धांत बनाम व्यावहारिक राजनीति की टकराहट दिखती है।
- Written By: अंकिता पटेल
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नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, आरएसएस से बचपन से जुड़े जिन निष्ठावान स्वयंसेवकों ने बीजेपी के माध्यम से राजनीति की राह चुनी है, उन्हें बहुत अखर रहा है कि पार्टी में अन्य दलों के लोगों की इनकमिंग को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है? ऐसे बाहरी लोग जिनमें संघ के बुनियादी संस्कार नहीं हैं उन्हें क्यों बीजेपी में एंट्री देकर सिर पर चढ़ाया जा रहा है? अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और बाहर से आए लोगों का स्वागत उन्हें बिल्कुल जंच नहीं रहा।
‘ हमने कहा, ‘प्रैक्टिकल राजनीति में ऐसी संकुचित सिद्धांतवादी बातें नहीं चलतीं। अपना राजनीतिक बेस या आधार मजबूत करने के लिए दूसरी पार्टी के लोगों को शामिल करना पड़ता है।
उन्हें चुनाव में टिकट और पद भी देने पड़ते हैं। यह पोलिटिकल नेसेसिटी है।’ पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज संघ में सिखाया जाता है कि पहले राष्ट्र, फिर समाज, फिर परिवार और अंत में स्वयं का विचार करो। बीजेपी में ऐसे अवसरवादी तत्वों की घुसपैठ को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है जो कभी संघ की शाखा में नहीं गए, गणवेश नहीं पहना और बौद्धिक नहीं सुना?’ हमने कहा, ‘बीजेपी ने पहले भी ऐसा किया है।
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शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, अरुण शौरी जैसे लोगों को केंद्र में मंत्री बनाया गया जिनका आरएसएस से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में तो फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना को विदेश राज्यमंत्री बनाया गया था। जब शुरुआत से निकली पतली धारा को प्रचंड प्रवाह बनना पड़ता है तो अनेक नदियों से संगम करना पड़ता है।
दूसरी पार्टियों को आपरेशन लोटस के तहत तोड़फोड़ कर सरकार बनानी पड़ती है। कुछ को जांच एजेंसियों से डराकर साथ में लाना पड़ता है। अपनी पकड़ मजबूत रखकर दूसरों से समझौते करने पड़ते हैं। राजनेता कोई साधु-संत नहीं होते। बीजेपी चाणक्य नीति पर चलकर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रही है।
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अटलबिहारी ने भी 24 पार्टियों की मिलीजुली सरकार चलाते समय ‘तन भी हिंदू मन भी हिंदू’ कहा था। वह खान-पान और बोलचाल में मस्तमौला थे। दत्तोपंत ठेंगड़ी, नानाजी देशमुख और गोविंदाचार्य को वाजपेयी की कार्यशैली पसंद नहीं थी।
कल्याणसिंह भी वाजपेयी के खिलाफ थे लेकिन वाजपेयी नई सोच रखकर कहते थे काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं!’
भाजपा
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
