
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, राजनीति में ड्रामेबाज नेताओं की कमी नहीं है. जनहित से ज्यादा उन्हें अपनी कुर्सी प्रिय लगती है. उसे हर कीमत पर बचाए रखने के लिए नेता और उनके समर्थक हर तरह की नौटंकी करते हैं. इस मामले में कोई उनका हाथ नहीं पकड़ सकता. बुरी तरह विफल हो जाने पर भी वे खुद को कामयाब और लोकप्रिय सिद्ध करना चाहते हैं.’’ हमने कहा, ‘‘कोई पहुंचा हुआ या घाघ व्यक्ति ही नेता बन पाता है. इसके लिए चालाकी, मक्कारी, धूर्तता, मतलबपरस्ती सभी कुछ आनी चाहिए. राजनीति करना संत-महात्माओं का काम नहीं है. इसमें जरूरत के मुताबिक छल-कपट, धोखेबाजी, वादाखिलाफी सबकुछ करना पड़ता है. अब आप मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेनसिंह को ही देख लीजिए, राज्य में 2 महीने से हिंसा जारी है लेकिन दंगों की आग में राजनेता हाथ सेंक रहे हैं. जब दबाव ज्यादा पड़ा तो बीरेन सिंह सीएम पद से इस्तीफा देने अपने बंगले से निकल पड़े. वे अपने इस्तीफे की घोषणा कर उसे राज्यपाल अनुसुइया उइके को सौंप पाते, इसके पहले ही उनके तथाकथित समर्थकों की भीड़ का नेतृत्व कर रही एक महिला ने आगे आकर उनका इस्तीफा ही फाड़ डाला. यह दिखाया गया कि बीरेन सिंह के समर्थकों को उनका त्यागपत्र देना बिल्कुल मंजूर नहीं था.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, यह तो हमें आपसी सेटिंग या मिलीभगत का मामला लगता है क्योंकि इस घटना के बाद बीरेन सिंह ने मुख्यमंत्री पद न छोड़ने की घोषणा कर दी.’’ हमने कहा, ‘‘इसे ही कहते हैं- किस्सा कुर्सी का! नेता इतने संवेदनहीन और कठोर होते हैं कि भले ही सबकुछ बरबाद या तबाह हो जाए लेकिन वे टस से मस नहीं होते. मणिपुर में बीजेपी की सरकार है लेकिन केंद्र दखल नहीं दे रहा. यदि विपक्षी पार्टी की सरकार होती तो उसे अबतक बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाता. बीरेन सिंह का रवैया कुछ ऐसा ही है कि रोम जल रहा था लेकिन वहां का सम्राट नीरो चैन की बांसुरी बजा रहा था.’’






