सम्राट चौधरी व नीतीश कुमार (डिजाइन फोटो)
BJP Bihar Politics: आखिर बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री बिठाने में कामयाब रही। इस तरह का वर्चस्व सधी हुई रणनीति के तहत हासिल किया जाता है। पहले राज्य में किसी दल से गठबंधन करो, मौका देखकर उसमें फूट डालो और अंततः सत्ता में अपना वर्चस्व बनाओ। इसी तरह की शतरंजी चाल बीजेपी ने विभिन्न राज्यों में चली है। आज देश के अधिकांश राज्यों में बीजेपी सत्तारूढ़ है तो उसका कारण केवल उसकी लोकप्रियता नहीं बल्कि कूटनीतिक दावपेंच भी हैं। इसे बीजेपी की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा कि उसने बिहार में नीतीश युग का सफाया कर दिया।
वटवृक्ष की तरह जमे सुशासन बाबू को राज्यसभा में भेजकर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने में समय तो लगा लेकिन बीजेपी ने साबित कर दिया कि दशकों तक छोटे भाई की भूमिका निभाने के बाद अब उसकी भूमिका बड़े भाई की हो गई है। सम्राट चौधरी विभिन्न दलों में रह चुके हैं। इस लिहाज से राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी हैं। तेजतर्रार होने की वजह से वह विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव से उन्हीं की भाषा में निपट सकते हैं।
इसके पहले कितने ही नामों को लेकर कयास लगाए जाते रहे लेकिन बीजेपी ने जो नाम पहले बताया था उसे ही बिहार का सीएम बनाया। जिन अन्य राज्यों में बीजेपी ने चुनाव जीता था वहां बिल्कुल नया चेहरा मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया था जैसे मध्य प्रदेश में मोहन यादव, ओडिशा में मोहन चरण माझी तथा राजस्थान में भजनलाल शर्मा।
बिहार में शुरू से सम्राट चौधरी का नाम सत्ता के गलियारों में चर्चित था। उनका राजनीतिक समीकरण और जोड़-तोड़ का कौशल देखते हुए बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाया, सम्राट चौधरी में ऐसा हुनर है कि वह सहयोगी पार्टी जदयू को तोड़कर बीजेपी को और मजबूत बना सकते हैं। अभी जदयू के 85 विधायक हैं। जिस तरह बीजेपी ने महाराष्ट्र में शिवसेना व राकां को तोड़ा वैसा ही खेल बिहार में आगे चलकर जदयू के साथ भी कर सकती है। रविशंकर प्रसाद या राजीव प्रताप रुड़ी जैसे बिहार के वरिष्ठ बीजेपी नेताओं की बजाय अक्खड़ नेता सम्राट चौधरी को कुछ खास उद्देश्यों के लिए ही सीएम बनाया गया है। सम्राट कम पढ़े-लिखे होने पर भी उखाड़-पछाड़ की राजनीति में माहिर हैं।
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विचार किया जाए कि इस समूचे घटनाक्रम में नीतीश कुमार को कौन सा लाभ मिला? मोदी को पीएम बनाने के लिए बहुमत जुटाने में नीतीश कुमार और चंद्राबाबू नायडू ने अपनी पार्टियों के सांसदों का सहयोग दिया था। अब नीतीश राज्यसभा के 250 सदस्यों में से एक बनकर रह गए हैं। यह कहना सिर्फ औपचारिकता है कि राज्य को अब भी उनका मार्गदर्शन मिलता रहेगा। ऐसा कोई संकेत नहीं है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बदले में उनके बेटे निशांत कुमार को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा। मानना होगा कि बीजेपी ने बड़ी सफाई से बिहार की सत्ता पर वर्चस्व हासिल किया। विधानसभा चुनाव में उसके पास कोई चेहरा नहीं था इसलिए नीतीश कुमार को आगे रखा। चुनावी जीत के बाद मतलब निकलते ही नीतीश को विदा कर दिल्ली भेज दिया गया।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा