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बदहाल हैं देश के 80 फीसदी सरकारी अस्पताल, सही इलाज की कोई गारंटी नहीं
- Written By: किर्तेश ढोबले
देश के 80 फीसदी सरकारी अस्पतालों की हालत बहुत खराब है। सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद वहां सही इलाज की गारंटी नहीं है। स्वास्थ्य के लिए सरकारी फंड कम है या जानबूझकर उदासीनता या लापरवाही बरती जा रही है? यह एक सवाल बन कर रह जाता है।

(डिजाइन फोटो)
लोग अस्वस्थ होने पर मोटी फीस लेनेवाले निजी अस्पतालों में क्यों जाते हैं, इसकी वजह स्पष्ट है। 80 फीसदी सरकारी अस्पतालों की हालत बहुत खराब है। सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद वहां सही इलाज की गारंटी नहीं है। स्तरीय तो दूर, सामान्य स्वास्थ्य सेवा का भी अभाव है। इस स्थिति से सभी अवगत हैं लेकिन अब तो सरकार ने खुद ही नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत आनेवाले अस्पतालों का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की है जो इन अस्पतालों के असली हालात से रूबरू कराती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आनेवाले 2,00,000 से भी अधिक अस्पतालों में से सिर्फ 40,451 ने ही अपनी जानकारी सरकार को दी है। इन अस्पतालों में से केवल 8,089 ही आईपीएचएस के मानकों पर खरे उतरे। यह पाया गया कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स और जरूरी उपकरणों की भारी कमी है। स्वास्थ्य केंद्र में 1 डॉक्टर समेत 5 कर्मचारी तैनात रहने चाहिए लेकिन राज्यों में इसकी कमी है। 8,000 से अधिक अस्पतालों में 14 तरह की जांच सुविधाएं नहीं हैं। नियमानुसार 10 से 20 हजार की आबादी पर एक स्वास्थ्य केंद्र होना अनिवार्य है। हर स्वास्थ्य केंद्र में ऑक्सीजनयुक्त 2 बिस्तर रहने चाहिए किंतु ऐसा नहीं नजर आ रहा है। इसकी वजह क्या है?
फंड कम है या लापरवाही?
6 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में आश्वासन दिया गया था कि देश की जीडीपी की 2.5 प्रतिशत रकम स्वास्थ्य पर खर्च की जाएगी। उसका क्या हुआ? स्वास्थ्य के लिए सरकारी फंड कम है या जानबूझकर उदासीनता या लापरवाही बरती जा रही है? नियमानुसार सरकारी अस्पतालों का 60 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाती है व शेष 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार को उठाना पड़ता है। 42 प्रतिशत अस्पतालों ने आईपीएचएस के मानकों पर 50 प्रतिशत से भी कम अंक हासिल किए जबकि 15,172 अस्पतालों को 50 से 80 प्रतिशत अंक मिले। अब केंद्र ने तय किया है कि नई सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर 70,000 सरकारी अस्पतालों को आईपीएचएस के मानकों के अनुरूप बनाया जाए और वहां के इलाज में गुणवत्ता लाई जाए। सरकार की ओर से इन अस्पतालों का औचक निरीक्षण भी किया जाएगा जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ये अस्पताल सरकार को जो जानकारी दे रहे हैं, वह सही है या नहीं?
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डॉक्टर नदारद रहते हैं
आमतौर पर यह शिकायत पाई जाती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर नदारद रहते हैं। यदि डॉक्टर मौजूद भी रहे तो दवाइयों का अभाव पाया जाता है। मरीज के रिश्तेदारों को बाहर से दवा खरीदकर लाने को कहा जाता है। यह भी शिकायत है कि कुछ सरकारी डॉक्टर अलग से प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते हैं। अब कहा गया है कि जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों व प्राइमरी हेल्थ सेंटर में नेशनल क्वालिटी अश्योरेंस स्टैंडर्ड (एनक्यूएएस) पहले की तरह मूल्यांकन करेगा लेकिन आयुष्मान आरोग्य मंदिर का मूल्यांकन अब वर्चुअली किया जाएगा। तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने आयुष्मान आरोग्य मंदिर नाम पर आपत्ति जताई है।
मशीनों का इस्तेमाल नहीं
सरकारी अस्पतालों में यदि स्वास्थ्य की जांच करनेवाली आधुनिक और कीमती मशीनें लगाई भी गई तो कभी उनका इस्तेमाल नहीं होता और वह रखे रखे खराब हो जाती हैं। यदि मशीन है लेकिन टेक्नीशियन नहीं तो मशीन का उपयोग नहीं पो पाता। बहुत से कुशल चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में सरकारी नौकरी करना नहीं चाहते। इसलिए या तो बड़े शहर का रुख करते हैं या प्राइवेट अस्पताल खोल लेते हैं। सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को चुस्त बनाने की आवश्यकता है क्योंकि हर मरीज प्राइवेट अस्पताल में इलाज का आर्थिक बोझ नहीं उठा सकता। ऐसी हालत में करोड़ों लोग कहां जाएंगे? ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार आवश्यक है। अभी ग्रामीण इलाके के सरकारी डॉक्टर मरीज को बड़े शहर भेज देते हैं। इस तरह कट प्रैक्टिस का धंधा चलता है और मरीज पर इलाज का बोझ बढ़ जाता है। लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
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