वट वृक्ष न मिले तो इस विधि से करें वट सावित्री व्रत (सौ.सोशल मीडिया)
आगामी 26 मई को वट सावित्री का व्रत पूरे देशभर में रखा जाएगा। वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। जो हर साल ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक की कामना करते हुए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।
ऐसी मान्यता है कि बरगद के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है और इसकी पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद मिलता है। इसके साथ ही जीवन में खुशहाली आती है। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस पाए थे, इसलिए इस दिन इस वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है।
हालांकि, आजकल हर जगह बरगद का पेड़ नहीं होता है। ऐसे में आइए इस खबर में जानते हैं कि इस दिन अगर आपको बरगद का पेड़ न मिल पाए है, तो पूजा कैसे कर सकते हैं।
वट वृक्ष न हो तो इस विधि से करें वट सावित्री व्रत :
करें बरगद की डाली या टहनी का इस्तेमाल
ज्योतिषयों के अनुसार, अगर आपके आसपास बरगद का पेड़ न मिले तो बरगद की डाली या टहनी का इस्तेमाल कर सकते है। आप कही से बरगद की डाली या टहनी मंगवा लें। इस टहनी को साफ कपड़े में लपेटकर अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें और इसे ही बरगद का प्रतीक मानकर पूजा करें। आप इस डाली पर कच्चा सूत बांधकर परिक्रमा भी कर सकते हैं।
रख सकते हैं बरगद के पेड़ की तस्वीर
इसके अलावा, बरगद का पेड़ न मिलने पर आप बाजार से बरगद के पेड़ की तस्वीर भी ला सकते हैं या इंटरनेट से डाउनलोड करके उसका प्रिंटआउट निकालकर उस तस्वीर की पूजा कर सकते हैं।
करें तुलसी का पौधा
जैसा कि आप जानते है हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को भी बहुत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। अगर आपको बरगद की डाली भी न मिल पाए, तो आप तुलसी के पौधे के पास वट सावित्री व्रत की पूजा कर सकते हैं। तुलसी को वट वृक्ष का प्रतीक मानकर आप सभी रीतियों का पालन करें और माता सावित्री से अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
अगर आपको बरगद की डाली, तुलसी का पौधा और पेड़ की तस्वीर न मिले तो आप अपने पूजा स्थान पर ही मन में बरगद के पेड़ का ध्यान करते हुए प्रतीकात्मक रूप से पूजा कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आपका भाव शुद्ध हो और सच्चा होना चाहिए, क्योंकि भगवान सिर्फ भाव के भूखे हैं।
आटे से बरगद का पेड़
अन्य मान्यताओं के अनुसार, आटे से बरगद का पेड़ बनाकर भी पूजा की जा सकती है। पूजा के बाद इस आटे को गाय या अन्य जानवरों को खिला दें या फिर किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें।