कब रखा जाएगा शीतला सप्तमी व्रत? जानें सही तिथि और शुभ मुहूर्त एक क्लिक में
Hindu Festival: शीतला सप्तमी का व्रत 10 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन पूजा के लिए शुभ समय सुबह 06:24 से शाम 06:26 तक है। मां शीतला की आराधना से स्वास्थ्य और खुशहाली का वरदान मिलता है।
- Written By: सीमा कुमारी
शीतला सप्तमी
Sheetala Saptami 2026: मां शीतला को समर्पित शीतला सप्तमी का व्रत हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन रखा जाता है। इस वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत 10 मार्च को शीतला सप्तमी मनाई जाएगी। धार्मिक मत है कि देवी मां शीतला की पूजा करने से आरोग्य जीवन का वरदान मिलता है। साथ ही सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। आइए, शीतला सप्तमी और अष्टमी की सही तिथि एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं-
शीतला सप्तमी 2026 – शुभ मुहूर्त और योग
चैत्र माह, कृष्ण पक्ष, सप्तमी
शुरुआत: 09 मार्च, रात 11:27 बजे
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समाप्ति: 11 मार्च, रात 01:54 बजे
मुख्य दिन पूजा के लिए: 10 मार्च 2026
पूजा का शुभ मुहूर्त
10 मार्च 2026, सुबह 06:24 बजे से शाम 06:26 बजे तक
इस समय साधक देवी मां शीतला की पूजा कर सकते हैं।
बसोड़ा: 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा।
शुभ योग
हर्षण योग: सुबह 08:21 बजे तक
रवि योग: संयोग में है
इस दिन पूजा करने से सिद्धि, शुभ कार्यों में सफलता और आरोग्यता का वरदान मिलता है।
शीतला अष्टमी की महिमा
शीतला अष्टमी का महत्व मुख्य रूप से स्वास्थ्य और संतान खुशी से जुड़ा है। इसे मानते हैं कि मां शीतला चेचक, बुखार और अन्य संक्रामक बीमारियों से रक्षा करती हैं।
यह पर्व हमें स्वच्छता, संयम और विश्वास का संदेश देता है। माता की कृपा से घर में सुख-शांति और बच्चों की सुरक्षा बनी रहती है।
संतान प्राप्ति के लिए शीतला अष्टमी व्रत
कई दंपत्तियों को संतान सुख में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में संतान प्राप्ति के लिए शीतला अष्टमी व्रत बेहद फायदेमंद माना जाता है।
शीतला अष्टमी (बसौड़ा) चैत्र कृष्ण अष्टमी को माता शीतला की पूजा का विशेष पर्व है, जिसमें आरोग्य और लंबी आयु के लिए बासी भोजन (ठंडा भोग) का भोग लगाया जाता है।
शीतला अष्टमी व्रत के मुख्य महत्व और मान्यताएं:
- आरोग्य की प्राप्ति: धार्मिक मान्यता है कि इस दिन माता शीतला की पूजा करने से चर्म रोग (Skin diseases) और भीषण गर्मी में होने वाले चेचक, खसरा जैसी बीमारियों से रक्षा होती है।
- बासी भोजन का भोग (बसौड़ा): इस दिन घरों में ताजा भोजन नहीं बनता, बल्कि एक दिन पहले (सप्तमी को) बना ठंडा भोजन माता को समर्पित किया जाता है।
- ऋतु परिवर्तन: यह व्रत शीत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है, जो शरीर को अंदर से ठंडा रखने का संदेश देता है।
- पौराणिक कथा और लाभ: व्रत कथा के अनुसार, यह व्रत माता की कृपा से संतान को आरोग्य और खुशियां प्रदान करता है, साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि लाता है।
- वैज्ञानिक आधार: चूँकि इस समय से मौसम गर्म होने लगता है, ठंडा भोजन करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
