13 अक्टूबर को निभाई जाएगी सिंदूर खेला की परंपरा, जानिए 450 साल पहले किसने की शुरुआत
पश्चिम बंगाल में अष्टमी पूजा यानि दुर्गाष्टमी की खासी धूम होती है इस दिन से ही यहां पर असल रूप में नवरात्रि के त्योहार की शुरुआत होती है। बंगाल में भव्य पंडालों में माता दुर्गा विराजमान रहती हैं तो वहीं पर दुर्गा पूजा के दौरान कई मान्यताएं प्रचलित हैं इसमें ही हैं सिंदूर खेला की परंपरा।
- Written By: दीपिका पाल
सिंदूर खेला की परंपरा (सौ.सोशल मीडिया)
Sindoor Khela 2024: शारदीय नवरात्रि का दौर जहां पर चल रहा हैं वहीं पर इस दौरान नवरात्रि का आज 5वां दिन जो मां स्कंदमाता को समर्पित होता है। इस मौके पर भक्ति के साथ पूजा करने का विधान होता है तो भक्त व्रत रखकर माता की पूजा करते है। पश्चिम बंगाल में अष्टमी पूजा यानि दुर्गाष्टमी की खासी धूम होती है इस दिन से ही यहां पर असल रूप में नवरात्रि के त्योहार की शुरुआत होती है। बंगाल में भव्य पंडालों में माता दुर्गा विराजमान रहती हैं तो वहीं पर दुर्गा पूजा के दौरान कई मान्यताएं प्रचलित हैं इसमें ही हैं सिंदूर खेला की परंपरा। इसे माता दुर्गा की विदाई से जोड़कर देखा जाता हैं जो नवरात्रि के अंत में बंगाल की सुहागिन महिलाएं खेलती है और इस दौरान धुनुची नृत्य भी किया जाता है।
450 साल पुरानी हैं परंपरा
पश्चिम बंगाल की यह प्रसिद्ध सिंदूर खेला की परंपरा 450 साल पुरानी बताई जाती हैं जब पश्चिम बंगाल में दुर्गा विसर्जन के दिन सिंदूर खेला का उत्सव मनाने की शुरुआत हुई थी। इस परंपरा को निभाने के पीछे वजह बताई जाती हैं कि, मां दुर्गा 10 दिन के लिए अपने मायके आती हैं, जिसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के अंतिम दिन सिंदूर खेला का पर्व मनाया जाता है। इस उत्सव को सिंदूर उत्सव के नाम से भी जाना जाता है।
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जानिए कैसे मनाते हैं सिंदूर खेला
यहां पर सिंदूर खेला की परंपरा को लेकर बात की जाए तो, इसे अंतिम दिन विसर्जन के समय महाआरती के साथ मनाने की शुरुआत की जाती है। इसमें आरती के बाद भक्तगण मां देवी को कोचुर, शाक, इलिश, पंता भात आदि पकवानों का प्रसाद चढ़ाते हैं। इसके बाद इस प्रसाद को सभी में बांटा जाता है। मां दुर्गा के सामने एक शीशा रखा जाता है, जिसमें माता के चरणों के दर्शन होते हैं। ऐसा मानते हैं कि इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। फिर सिंदूर खेला शुरू होता है। इस परंपरा में महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं तो और धुनुची नृत्य कर माता को विदाई देती है। बता दें कि, अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दुर्गा विसर्जन किया जाता है।
