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Shankaracharya Jayanti: आज के ही दिन जन्मे थे शंकराचार्य, जानिए कहां हुआ था उनका जन्म और उनका अमर योगदान
Adi Guru Shankaracharya: शंकराचार्य जयंती के अवसर पर जानिए आदि शंकराचार्य के जन्मस्थान, उनके अद्वैत वेदांत दर्शन और सनातन धर्म के पुनर्जागरण में उनके अमूल्य योगदान के बारे में।
- Written By: सीमा कुमारी

आदि शंकराचार्य ( सौ. Gemini)
Shankaracharya Jayanti Pooja Date And Puja Timings : ज्ञान, वैराग्य और आध्यात्मिक एकता का जब भी जिक्र होता है, तो सबसे पहले नाम आता है आदि शंकराचार्य का। आज 21 अप्रैल को आदि शंकराचार्य की जयंती पूरे देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है।
धर्म शास्त्रों में बताया गया हैं कि भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले आचार्य शंकर बहुत कम उम्र में वेद, पुराण आदि धर्म शास्त्रों का अध्ययन करके सनातनी लोगों को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य किया था।
बताया जाता है कि,आदि शंकराचार्य के द्वारा लिखे गये धर्मग्रंथ और भक्ति स्तोत्र आज भी सनातन परंपरा से जुड़े लोगों को धर्म की सही राह दिखाने का कार्य कर रहे हैं। ऐसे में आज आदि शंकराचार्य की जयंती के शुभ अवसर पर आइए जानते है उनके जीवन से जुड़ी 7 महत्वपूर्ण बातों के बारे में –
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आदि गुरु का जीवन और संन्यास का संकल्प
इतिहासकारों के अनुसार, आदि शंकर का जन्म 788 ई. में वैशाख मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि पर केरल के कलादी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम विशिष्ठा देवी था। कहा जाता है कि, लंबे समय तक नि:संतान रहने वाले इस दंपत्ति ने जब कठिन शिव साधना की तो महादेव ने प्रसन्न होकर उनके घर में जन्म लेने का आशीर्वाद प्रदान किया।
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एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया
बताया जाता है कि, शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में लंबी दूरी की यात्राओं को करते हुए भारत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। उन्होंने दक्षिण दिशा में श्रृंगेरी मठ, पूर्व दिशा में गोवर्धन मठ, पश्चिम दिशा में शारदा मठ और उत्तर दिशा में ज्योतिर्मठ को स्थापित किया। आचार्य शंकर से जुड़े ये मठ आज भी सनातनी लोगों को एक सूत्र से जोड़े हुए है।
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चारों दिशाओं में जीवित है शंकराचार्य परंपरा
आदि शंकराचार्य (Shankaracharya Jayanti) द्वारा स्थापित इन्हीं चार पावन पीठों में उनकी परंपरा से जुड़े आचार्य आज भी पीठासीन हैं, जिन्हें सनातनी लोग परम पूज्य शंकराचार्य जी के नाम से संबोधित करते हैं। वर्तमान में पूर्व में गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती, दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ जी, पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती और उत्तर में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं।
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भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एकजुट किया है
आदि शंकराचार्य देश के चार कोनों में (पुरी, श्रृंगेरी, द्वारका और जोशीमठ) चार मठों की स्थापना करके न सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से बल्कि भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एकजुट किया है आज अलग-अलग भाषा, पहनावे और संस्कृतियों वाले लोग एक सनातन सूत्र से जुड़े हुए इन चारों मठों पर जाकर दर्शन और पूजन करते हैं ।
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अपने प्राणों की बाजी
आदि शंकराचार्य ने सनातन की रक्षा के लिए अखाड़े बनाए, जिससे जुड़े साधु न सिर्फ धर्म-अध्यात्म का ज्ञान देते हैं, बल्कि सनातन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को तैयार रहते हैं वन, अरण्य, पुरी, आश्रम, भारती, गिरि आदि नाम के नागा साधुओं की टोली को शंकराचार्य की सेना कहा जाता है।
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पंचायतन पूजा’ की व्यवस्था
इतिहासकारों के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने सनातन परंपरा से जुड़े लोगों की आस्था में पनपे मतभेद को दूर करने के लिए ‘पंचायतन पूजा’ की व्यवस्था महज 8 वर्ष की आयु में वेद-पुराण आदि शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने वाले आदि शंकर ने भारत में वैदिक परंपरा को मजबूत करने का काम किया ।
Shankaracharya jayanti birthplace and contributions of adi shankaracharya
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