Premanand Ji Maharaj Republic Day Special (Source. Design)
Premanand Ji Maharaj Republic Day Special: Republic Day के मौके पर श्री प्रेमानंद जी महाराज का यह प्रेरक संदेश सिर्फ साधकों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन में संघर्ष, अभाव और असफलताओं से जूझ रहा है। महाराज कहते हैं ईश्वर की उपासना का मार्ग आसान नहीं होता। इस रास्ते पर चलने के लिए ऐसा संकल्प चाहिए जिसे न शरीर का कष्ट तोड़ सके, न समाज की आलोचना और न ही मन की चंचलता।
साधक को सबसे पहले एक पवित्र शपथ लेनी होती है चाहे माया कितना भी दर्द दे या लालच दिखाए, भगवान का मार्ग नहीं छोड़ा जाएगा। जो लोग केवल सांसारिक सुख के लिए भक्ति में आते हैं, उनका पतन निश्चित है। उपासक का स्वभाव गंभीर और सहनशील होना चाहिए।
महाराज चेतावनी देते हैं कि साधना के अनुभव या अपनी कमजोरियों को सबके सामने कहना आत्मिक शक्ति को नष्ट कर देता है। यह बातें केवल भक्त, गुरु और भगवान के बीच रहनी चाहिए। सकामता यानी स्वार्थपूर्ण इच्छा सबसे बड़ा खतरा है। दबाई गई एक छोटी-सी इच्छा भी बीस साल बाद साधना को गिरा सकती है। यह इच्छाएं मीठे ज़हर जैसी हैं, जो अंत में आत्मा को जला देती हैं। इनका एक ही उपाय है निरंतर “नाम जप” और संसार से वैराग्य।
श्रीधाम वृंदावन में रहकर भी यदि राधा-कृष्ण की लीलाओं का स्मरण न हो, तो यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। सच्चा वृंदावन-वास शरीर से नहीं, मन से होता है। महाराज कहते हैं यह संकल्प लें कि चाहे शरीर “सौ टुकड़ों में काट दिया” हो जाए, फिर भी धाम नहीं छोड़ेंगे। यह अटूट निष्ठा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि:
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साधक का बाहरी स्वभाव नारियल जैसा होना चाहिए ऊपर से कठोर, भीतर से कोमल। “मैं” और “मेरा” का त्याग कर, यानी “निर्ममो निरहंकार” बनकर ही प्रगति संभव है। हर परिस्थिति में नाम जप करें भीड़ में, अकेले, भूखे-प्यासे भी। शरीर को अपना नहीं, गुरु और भगवान की “विश्वास” मानें। महाराज कहते हैं, यह एक “सस्ता सौदा” है जिस शरीर को आपने जन्मों से माया को सौंपा, उसे एक बार माया के स्वामी को सौंप दीजिए, मोक्ष निश्चित है।