बंद करो ये गंदी बातें करना! प्रेमानंद जी महाराज की चेतावनी, कहीं यूं ही न निकल जाए अनमोल मानव जीवन

Premanand Ji Maharaj Ki Baat: मनुष्य जीवन ईश्वर का दुर्लभ वरदान है, लेकिन आज इंसान इसे क्षणिक सुखों के पीछे भागकर व्यर्थ कर रहा है। श्री प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट शब्दों में चेताते हैं।
Premanand Ji Maharaj warns against wasting precious human lives.
Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
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Importance of Human Life: मनुष्य जीवन ईश्वर का दुर्लभ वरदान है, लेकिन आज इंसान इसे क्षणिक सुखों के पीछे भागकर व्यर्थ कर रहा है। श्री प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट शब्दों में चेताते हैं, "बंद करो ये गंदी बातें करना!" क्योंकि इंद्रिय विषयों का निरंतर चिंतन, सुनना और देखना आत्मा को पतन की ओर ले जाता है और यही नरक समान दुखों का मार्ग बनता है।

नाशवान सुखों का मोह और आत्मा की उपेक्षा

करोड़ों जन्मों से हम देह के आकर्षणों में उलझे रहे हैं। अब समय आ गया है कि संयम अपनाकर आत्मा और परम तत्व के दिव्य स्वरूप का अनुभव किया जाए। भोग-विलास का सुख क्षणिक है, लेकिन उसका परिणाम केवल शोक और विनाश है।

यौवन और धन का घमंड सबसे बड़ा भ्रम

अक्सर मनुष्य यौवन और धन के अहंकार में जीता है, यह भूलकर कि जीवन कच्चे घड़े के पानी जैसा है कभी भी रिस सकता है या टूट सकता है। यौवन और सौंदर्य बिजली की चमक की तरह क्षणभंगुर हैं। धोखे से कमाया गया धन खुशी नहीं देता, बल्कि बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है और शराब, हिंसा व व्यभिचार जैसे दुर्गुणों को जन्म देता है।

धन का सही उपयोग ही सच्चा धर्म

सच्चा धन वह है, जो समाज की सेवा में लगे। अगर आपके पास अधिक है, तो भूखों को भोजन दें, बीमारों का इलाज कराएं, पशु-पक्षियों की सेवा करें। दूसरों के दुख में आंख मूंदकर अपने भोग के लिए धन खर्च करना पूर्ण विनाश का मार्ग है। धर्म की रक्षा करने वाले की स्वयं धर्म रक्षा करता है।

तीर्थ यात्रा या पिकनिक? जानिए फर्क

श्रीधाम वृंदावन, हरिद्वार या काशी जैसे तीर्थ स्थल मनोरंजन की जगह नहीं हैं। यहां का फल तपस्या से ही मिलता है।

  • संयम अपनाएं: लग्ज़री होटल और भोग-विलास छोड़कर उपवास व जप करें।
  • पवित्रता रखें: गंदगी, थूकना और निंदा से बचें। तीर्थ में किया गया एक पाप करोड़ों गुना भारी होता है, जैसे एक पुण्य अनंत फल देता है।
  • नाम-स्मरण करें: वाणी की तपस्या नाम संकीर्तन सभी पापों का नाश करती है।

हृदय से निकली प्रार्थना का चमत्कार

भगवान सच्चिदानंद स्वरूप हैं और अत्यंत करुणामय हैं। उन्हें न सोना चाहिए, न भेंट क्योंकि सब कुछ उन्हीं का है। उन्हें चाहिए केवल आर्त-प्रार्थना, जो छल से रहित हो। ऐसी पुकार का उत्तर तुरंत मिलता है।

दीनबंधु की शरण ही अंतिम उपाय

शरीर रोगों का घर है, मन काम-क्रोध से घिरा है और मृत्यु सिर पर नाच रही है। इस माया-सागर को पार करने की शक्ति हमारे पास नहीं। एकमात्र उपाय है दीनबंधु की पूर्ण शरण। भगवान से कहिए, "मेरे पास आपको देने को कुछ नहीं जो आपका न हो; मेरा शरीर दुर्बल है और मन चंचल है, इसलिए मैं आपकी कृपा में पूर्ण समर्पण करता हूं।"

वृंदावन में श्रीराधा के प्रेम के साधक के लिए वैकुंठ की महिमा भी आकर्षक नहीं। अभी मन को मनमोहन की ओर मोड़ लीजिए, क्योंकि मानव जन्म के बाद केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है।

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