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नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर अवश्य पढ़ें मां कात्यायनी की कथा, हर कष्ट होगा दूर और पूरी होंगी सभी मनोकामनाएं
- Written By: सीमा कुमारी
Navratri Sixth Day Vrat Katha: मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा और व्रत कथा का पाठ करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। उनकी कृपा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है।

मां कात्यायनी (सौ. Gemini)
Maa Katyayani Vrat Katha: आज चैत्र नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन विधि-पूर्वक पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और विवाह से जुड़ी हर तरह की बाधाएं दूर होती हैं। पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ करना भी बेहद जरूरी माना जाता है, क्योंकि इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए पढ़ते हैं मां कात्यायनी की पावन व्रत कथा—
देवी कात्यायनी की कथा
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, ‘कत’ नामक एक प्रसिद्ध महर्षि हुआ करते थे। उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम कात्य पड़ा। आगे चलकर ऋषि कात्य के गोत्र में एक महर्षि कात्यायन हुए, जो अपने तप के कारण पूरे संसार में जाने गए। ऋषि कात्यायन की एक मनोकामना थी कि देवी दुर्गा उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लें।
ऐसे में मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए महर्षि कात्यायन ने वर्षों तक कठोर तपस्या भी की। ऋषि के घोर तप से प्रसन्न होकर मां अंबे ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा पूरी करने का वचन भी दिया।
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इसके बाद देवी ने अपना वचन पूरा करते हुए और ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया। उनकी पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण ही देवी भगवती का नाम कात्यायनी पड़ा।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने बड़े ही प्रेम से देवी कात्यायनी का पालन-पोषण किया था। इधर पृथ्वी पर महिषासुर का आंतक बढ़ता जा रहा था, वह दुराचारी सारी सीमाएं लांघ रहा था।
दरअसल, महिषासुर को ये वरदान मिला हुआ था कि कोई भी पुरुष कभी उसे पराजित नहीं कर सकता, ना उसका अंत कर पाएगा। इसलिए उसे किसी का डर नहीं था और देखते ही देखते उसने देवलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया था।
तब भगवान विष्णु, ब्रह्मा और महादेव ने उसका अंत करने के लिए अपने तेज से एक शक्ति को उत्पन्न किया। मान्यता है कि महर्षि कात्यायन ने ही इस देवी की सर्वप्रथम विधिवत पूजा की थी, इसलिए देवी को कात्यायनी के नाम से जाना गया।
यह भी पढ़ें:- आज नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी को लगाएं इन चीजों का भोग, दूर होंगे सभी कष्ट
वहीं, देवी कात्यायनी से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, आश्विन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महर्षि कात्यायन के घर देवी की उत्पत्ति हुई थी। इसके बाद महर्षि ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक अपने आश्रम में देवी की विधिवत पूजा की और दशमी को देवी के इस स्वरूप ने महिषासुर का वध किया था। जिसके कारण ही देवी के इस स्वरूप को कात्यायनी के नाम से जाना गया था। वहीं, महिषासुर का वध करने के कारण देवी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से भी जाना गया।
एक अन्य कथा के अनुसार, देवी दुर्गा का कात्यायनी स्वरूप अमोघ फलदायिनी है। ब्रज की गोपियों ने करुणावतार श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाने के लिए कालिंदी यमुना के किनारे देवी कात्यायनी की ही आराधना की थी। यही वजह है कि आज भी मां कात्यायनी पूरे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वहीं, स्कन्द पुराण में देवी कात्यायनी के बारे में उल्लेख मिलता है कि उनकी उत्पत्ति परमेश्वर के सांसारिक क्रोध से हुई थी।
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