Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Premanand Ji Maharaj Message: इस मानव जीवन में सबसे बड़ा अवसर आत्मिक मुक्ति का होता है, लेकिन अधिकांश लोग इसे सांसारिक उलझनों में गंवा देते हैं। श्री प्रेमानंद जी महाराज का यह संदेश इसी सत्य की ओर इशारा करता है कि यह जीवन यूं ही हाथ से न निकल जाए। जब कोई संत हमें समझाता है, डांटता है या प्रेम दिखाता है, तो उसका उद्देश्य अपना लाभ नहीं, बल्कि हमारा कल्याण होता है। संत का हर शब्द मन को संसार के बंधनों से मुक्त कर उसे दिव्य युगल चरणों में समर्पित करने के लिए होता है।
अक्सर जब हमें सांसारिक रिश्तों से दूरी बनाने की बात कही जाती है, तो हमें लगता है कि यह हमारे अपने लोगों पर हमला है। लेकिन सच्चाई यह है कि काल पहले ही इन रिश्तों को हमसे छीन लेता है। हम चाहकर भी इन्हें स्थायी नहीं बना सकते। यदि हम इन्हीं आसक्तियों को पकड़े-पकड़े संसार छोड़ते हैं, तो आध्यात्मिक पतन निश्चित है। वहीं यदि इन्हें ईश्वर को समर्पित कर दें, तो यही बंधन मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।
सच्ची भक्ति का अर्थ है माता, पिता, पति-पत्नी से जुड़े प्रेम को पूरी तरह प्रभु में स्थानांतरित कर देना। हम कहते तो हैं कि ईश्वर सबमें है, लेकिन मन अब भी ‘मेरा-तेरा’ के राग में उलझा रहता है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी है कि पहले संसार से मन हटे और गुरु व इष्ट के साथ एकनिष्ठ संबंध स्थापित हो।
गृहस्थ जीवन और संन्यास में गहरा अंतर है। निवृत्ति मार्ग पर चलने वाले के लिए परिवार या धन पर निर्भर रहना निषिद्ध है। श्री रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपार संपत्ति छोड़कर तुच्छ भिक्षा पर जीवन बिताया, ताकि उनका वैराग्य शुद्ध बना रहे। जो ईश्वर का मार्ग चुनता है, उसे भगवान की पूर्ण सुरक्षा पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
वृंदावन में रहने के लिए तिनके से भी छोटा बनना पड़ता है। हर जीव में प्रभु को देखकर किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए। याद रखें, आपकी अपनी कोई शक्ति नहीं संसार के कीचड़ से निकलने की सामर्थ्य केवल गुरु और प्रभु की कृपा से मिलती है।
ये भी पढ़े: मृत्यु के बाद भी मां से मिलने लौटे कर्ण, जानिए क्यों एक रात के लिए फिर जीवित हुए महाभारत के दानवीर
असली समर्पण तब होता है, जब हर सांसारिक सहारा टूट जाता है। द्रौपदी और गजेंद्र की तरह, जब कोई नहीं बचता, तब शुद्ध शरणागति होती है। संतों को भी ईर्ष्या, निंदा और विरोध झेलना पड़ता है चाहे प्रह्लाद हों, मीरा हों या अन्य महापुरुष। फिर भी सच्चा भक्त नाम बल से सबके लिए करुणा ही रखता है।
संसार पर भरोसा मत रखो। सांसारिक सहारों से भागकर केवल गुरु और भगवान की शरण में जाओ। नाम जप और एकनिष्ठ भक्ति से मन शांत होगा और भीतर की दिव्य ज्योति स्वयं प्रकट हो जाएगी।