श्रीकृष्ण की शरण में ऐसा समर्पण, जो बदल दे जीवन, प्रेमानंद महाराज की सच्ची सलाह
Lord Krishna Sharanagati: शास्त्र बताते हैं कि यह भटकाव अनंत जन्मों से चला आ रहा है और इसका मुख्य कारण भगवान से दूरी है। जब साधक पूरी निष्ठा से श्रीकृष्ण के चरणों में आत्म-समर्पण करता है।
- Written By: सिमरन सिंह
Shri Premanand Ji Maharaj with krishna (Source. Pinterest)
Lord Krishna Bhakti: जीवन की भागदौड़, जिम्मेदारियों और चिंताओं के बीच इंसान अक्सर भटक जाता है। शास्त्र बताते हैं कि यह भटकाव अनंत जन्मों से चला आ रहा है और इसका मुख्य कारण भगवान से दूरी है। जब साधक पूरी निष्ठा से श्रीकृष्ण के चरणों में आत्म-समर्पण करता है, तब उसे किसी और सहारे की जरूरत नहीं रहती। सर्वधर्मान परित्यज्य का भाव अपनाते ही जीवन में स्थिरता और शांति आ जाती है।
माया और देह-अभिमान का जाल
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह स्वयं को केवल शरीर मान लेता है। माता-पिता, परिवार और रिश्तों में इतना उलझ जाता है कि भीतर बैठे परमात्मा को भूल जाता है। यह विपरीत ज्ञान माया के कारण उत्पन्न होता है। अहंकार के कारण हम अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते, जबकि सच्चाई यह है कि हमने मन, वाणी और कर्म से अनेक भूलें की हैं। जब तक हम प्रभु के सामने अपने अपराधों को स्वीकार नहीं करते, तब तक उनकी कृपा का पूर्ण अनुभव नहीं होता।
संतों का महत्व और सावधानी
आज के समय में कई लोग धन और भौतिक सुख को ही सब कुछ मान लेते हैं और संतों को महत्व नहीं देते। लेकिन शास्त्रों में संतों को प्रभु तक पहुँचने का माध्यम बताया गया है। जो व्यक्ति संतों का अनादर करता है, वह भक्ति मार्ग से दूर हो जाता है। यदि हमें अपनी प्रार्थना श्रीजी तक पहुँचानी है, तो संतों की शरण ही सबसे सरल मार्ग है। उनके चरणों में झुकने से हमारी बात बिना किसी बाधा के प्रभु तक पहुँच जाती है।
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भक्ति का असली अर्थ: दासता का भाव
भक्ति केवल मांगने का नाम नहीं है, बल्कि प्रभु की सेवा में स्वयं को समर्पित करने का नाम है। जब मन में निरंतर सेवा का भाव और प्रभु का स्मरण बना रहता है, तब जीवन में एक अलग ही आनंद आता है। यह स्थिति ऐसी होती है कि जागते और सोते समय भी भक्त प्रभु के करीब महसूस करता है।
जीवन का अंतिम सच
यह मनुष्य जीवन एक अवसर है एक ऐसा दांव, जिसमें सही निर्णय ही जीवन को सफल बनाता है। संसार की मोह-माया हमें दुख की ओर ले जाती है, जबकि प्रभु के चरणों में थोड़ी सी भी आसक्ति हमें परम शांति और मुक्ति दिला सकती है।
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पूर्ण समर्पण से क्या मिलेगा?
जब साधक पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण की शरण में आ जाता है, तब उसके सभी कर्म बंधन समाप्त हो जाते हैं। श्री किशोरी जी की कृपा इतनी असीम है कि वे अपने भक्तों की हर सच्ची इच्छा को पूरा करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।
जीवन का उपदेश
अनन्य शरणागति केवल एक धार्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन को सरल, शांत और सार्थक बनाने का मार्ग है। अगर मन से प्रभु को अपना लिया जाए, तो हर चिंता अपने आप खत्म हो जाती है।
