जब चंद्रभागा ने शोभन को दिलाया स्वर्ग, जानिए इस एकादशी व्रत की क्या है पौराणिक कथा
Rama Ekadashi Importance: एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति का सबसे उत्तम तिथि माना गया है। किसी भी व्रत में कथा का पाठ करना जरूरी माना जाता है, वरना उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
- Written By: सीमा कुमारी
जानिए क्या है रमा एकादशी की कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Rama Ekadashi Vrat Katha:आज 17 अक्टूबर को कार्तिक महीने की एकादशी यानी रमा एकादशी मनाई जा रही है। एकादशी व्रत का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। क्योंकि, यह हिन्दू धर्म के शुभ एवं पावन महीना यानी कार्तिक महीने में पड़ता हैं। यह एकादशी जगत के पालहार भगवान भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त भगवान विष्णु का सच्चे भक्तिभाव से पूजन और व्रत करता है, उसका जीवन खुशियों से भर जाता है। उस पर भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हे भगवन मुझे कार्तिक कृष्ण एकादशी की महिमा के बारे में बताइए।
तब भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को कार्तिक कृष्ण एकादशी यानी रमा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा कि इस व्रत को करने से व्यक्ति की जाने-अनजाने में किए हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। आइए पढ़ते हैं रमा एकादशी की व्रत कथा।
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जानिए क्या है रमा एकादशी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत समय पहले मुचुकुंद नामक एक महान राजा राज्य करता था। वह बहुत ही सत्यवादी, धर्मपरायण था और भगवान विष्णु के परम भक्त भी था। उसकी पुत्री का नाम चंद्रभागा था, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के बेटे शोभन से हुआ। एक दिन शोभन ससुराल आया। उसके कुछ ही दिनों में रमा एकादशी आने वाली थी, जिस पर राजा मुचुकुंद ने पूरे नगर में यह घोषणा कर दी कि एकादशी के दिन कोई भी व्यक्ति भोजन ग्रहण नहीं करेगा। यह बात सुनकर शोभन बहुत परेशान हो गया और उसने अपनी पत्नी चंद्रभागा से कहा कि ”वह भोजन किए बिना नहीं रह सकूंगा।”
तब चंद्रभागा शोभन से कहती है कि इस नगर में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी भी एकादशी व्रत धारण करते हैं। ऐसे में अगर आपको भोजन करना है, तो नगर से कहीं दूर चले जाइए, अन्यथा आपको व्रत धारण करना होगा। यह सुनकर शोभन कहता है कि हे प्रिये, मैं इस व्रत को अवश्य करूंगा, मेरे भाग्य में जो लिखा है, वही होगा।”
शोभन ने पूरी श्रद्धा के साथ एकादशी का व्रत रखा। दिन बीतने के बाद शोभन को कमजोरी महसूस होने लगी। रात में जागरण के समय उसकी हालात और भी खराब हो गई। सुबह होने से पहले शोभन की मृत्यु हो गई। तब उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कर दिया गया। पिता की बात मानकर चंद्रभागा अपने पिता के घर ही रहने लगी।
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एक दिन राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि रमा एकादशी के प्रभाव से उनके दामाद शोभन को वहां पर धन-धान्य से एक सुंदर देवपुर की प्राप्ति हुई है। लौटने के बाद यह बात राजा ने अपनी पुत्री को बताई, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई। इसके बाद चंद्रभागा ने भी रमा एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से वह भी अपने पति के पास चली गई।
