दिवाली की सुबह सूप पीटने की असल वजह जानिए
धनतेरस के साथ दिवाली महापर्व का आगाज हो चुका हैं। यह पर्व हर साल देशभर में बहुत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस त्योहार आस्था से जुड़ी तमाम ऐसी परंपराएं हैं, जिनका आज भी लोग निर्वहन करते आ रहे हैं। ऐसी ही एक है दिवाली के भोर में सूप पीटने की परंपरा। आपको बता दें, यह परंपरा मुख्य रूप से बिहार और यूपी में खासतौर पर निभाई जाती हैं।
- Written By: सीमा कुमारी
दिवाली के भोर में सूप पीटने की परंपरा।
Diwali 2024: धनतेरस के साथ दिवाली महापर्व का आगाज हो चुका हैं। यह पर्व हर साल देशभर में बहुत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस त्योहार आस्था से जुड़ी तमाम ऐसी परंपराएं हैं, जिनका आज भी लोग निर्वहन करते आ रहे हैं। ऐसी ही एक है दिवाली के भोर में सूप पीटने की परंपरा। आपको बता दें, यह परंपरा मुख्य रूप से बिहार और यूपी में खासतौर पर निभाई जाती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं इस परंपरा के बारे में-
जानिए क्या है इस प्रथा का उद्देश्य
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दिवाली की भोर यानी ब्रह्मकाल में सूप पीटने की प्रथा का उद्देश्य घर से दरिद्रता को बाहर निकालकर समृद्धि और वैभव को आमंत्रित करना हैं। इस दिन महिलाएं सूप बजाकर ‘दुख-दरिद्रता बाहर जाए-अन्न-धन लक्ष्मी घर में आएं’. कहते हुए पूरे घर में ध्वनि करती हैं। इसके बाद इसे घर के आंगन से निकाल कर दूर तक ले जाती हैं। इस परंपरा के अंत में सूप और झाड़ू को खेतों या चौराहों पर फेंक दिया जाता है, ताकि नकारात्मकता और गरीबी लौटकर घर न आए।
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ज्योतिषयों के अनुसार, यह परंपरा महिलाओं को पूर्वजों से विरासत में मिली है। यह क्रिया महिलाओं को मानसिक संतोष भी देता है। क्योंकि, ऐसा करने से उन्हें लगता है कि उन्होंने लक्ष्मी का स्वागत किया है और घर से गरीबी को बाहर निकाल दिया है। उनका विश्वास है कि यह अनुष्ठान घर में धन, वैभव और शांति लाता है।
आखिर सूप और लकड़ी का उपयोग क्यों किया जाता है
ज्योतिष बताते हैं कि, जब महिलाएं सूप और लकड़ी को गांव के बाहर छोड़ आती हैं। तो कई स्थानों पर इसे चौराहे पर जलाने की परंपरा भी है। इस पूरे अनुष्ठान के दौरान इस्तेमाल किए गए सूप और झाड़ू को जला देने का रिवाज यह संकेत देता है कि दरिद्रता और नकारात्मकता को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है।
