
Hanuman ji lanka dahan (Source. Pinterest)
Lanka Dahan Mystery: रामायण में वर्णित लंका दहन की घटना को अक्सर लोग हनुमान जी के क्रोध से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा गहरी और रणनीतिक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी ने लंका को जलाना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि यह रावण के खिलाफ युद्ध से पहले एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक चाल थी। इसका उद्देश्य केवल विनाश नहीं, बल्कि शत्रु के मन में भय और अस्थिरता पैदा करना था।
जब हनुमान जी माता सीता का संदेश लेकर लंका पहुंचे, तो रावण ने उन्हें दूत मानने के बजाय बंदी बना लिया। रावण की सभा में हनुमान जी का अपमान किया गया और उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया गया। यहीं से कहानी नया मोड़ लेती है। हनुमान जी ने इस अपमान को अपने अहं पर नहीं लिया, बल्कि इसे अवसर में बदला। उन्होंने अपनी पूंछ को असाधारण रूप से बढ़ाया, जिससे आग पूरे नगर में फैलने लगी।
लंका दहन किसी आवेश में की गई कार्रवाई नहीं थी। यह रावण के लिए एक स्पष्ट चेतावनी थी कि वह प्रभु राम की शक्ति और उनके दूत की क्षमता को कम न आंके। हनुमान जी ने पूरी लंका को जलाकर यह संदेश दिया कि अगर एक दूत अकेले इतना विनाश कर सकता है, तो राम की सेना के सामने रावण का टिकना असंभव है। यह कार्य युद्ध से पहले रावण पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की एक कुशल रणनीति थी।
लंका दहन को आज की भाषा में Psychological Warfare कहा जा सकता है। हनुमान जी ने बिना किसी सेना के, अकेले ही रावण की राजधानी को हिला दिया। इससे लंका की जनता और स्वयं रावण के मन में भय बैठ गया। यह संकेत था कि युद्ध अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी लड़ा जाएगा। रावण समझ चुका था कि उसका अंत अब दूर नहीं है।
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हनुमान जी का यह कृत्य यह सिखाता है कि शक्ति का सही उपयोग वही है, जो बुद्धि और धर्म के साथ किया जाए। उन्होंने माता सीता को कोई नुकसान नहीं होने दिया और केवल रावण की अहंकारी सत्ता को निशाना बनाया। इस तरह लंका दहन केवल एक घटना नहीं, बल्कि रणनीति, चेतावनी और धर्म की विजय का प्रतीक बन गया।






