भंडारे का प्रसाद
Religious Place Community Meal: हिंदू धर्म में दान-पुण्य पर विशेष महत्व दिया गया है। आर्थिक रूप से संपन्न लोग गरीबों के लिए लंगर या भंडारे का आयोजन करते हैं, जिससे उनको एक समय का खाना आसानी से मिल सके। सनातन धर्म में कहा गया है कि भूखे को खाना मिलाने से बड़ा पुण्य कोई नहीं है। इसी पुण्य की प्राप्ति या फिर किसी मनोकामना की पूर्ति होने पर भगवान का धन्यवाद अदा करते हुए भंडारे का आयोजन किया जाता है।
कई लोग संपन्न होने के बाद भी लजीज खाने की चाहत में भंडारे में पहुंच जाते हैं। क्योंकि लंगर के खाने का स्वाद ही अलग होता है। जबकि शास्त्रों के मुताबिक भंडारे का खाना खाने से पाप चढ़ता है। भंडारे का खाना वाकई सभी को खाना चाहिए या नहीं पढ़ें यहां
शास्त्रों के अनुसार, भंडारा मुख्य रूप से जरूरतमंदों, असहायों, भिक्षुकों और साधु-संतों के लिए आयोजित किया जाता है। यह उन लोगों के लिए वरदान है जो स्वयं भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। यदि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति बिना सोचे-समझे भंडारे का भोजन ग्रहण करते हैं, तो यह जरूरतमंद का हक छीनने जैसा माना जाता है। कई विद्वान इसे अप्रत्यक्ष रूप से पाप का कारण बताते हैं, क्योंकि इससे दान का सच्चा फल नष्ट होता है।
भगवद्गीता (अध्याय 17) में भोजन को सात्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकार का बताया गया है। भोजन न केवल शरीर बल्कि मन और चित्त को प्रभावित करता है। यदि भंडारा गलत कमाई, दिखावे, अहंकार या राजनीतिक उद्देश्य से आयोजित हो, तो उसका भोजन शुद्ध नहीं रहता है। ऐसा भोजन ग्रहण करने से व्यक्ति अप्रत्यक्ष रूप से उन नकारात्मक कर्मों का भागीदार बन सकता है।
भंडारे में भोजन करना न केवल पुण्य का कार्य है, बल्कि यह भोजन के प्रति कृतज्ञता और संतुलन की भावना को भी विकसित करता है। इसे श्रद्धा और संयम के साथ लेने पर शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, भंडारे में भोजन करना उचित है, बशर्ते इसे साफ-सुथरे और श्रद्धापूर्वक तरीके से ग्रहण किया जाए। यह धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से लाभकारी माना गया है।
धार्मिक स्थलों जैसे मंदिर, आश्रम या गुरुद्वारों में आयोजित भंडारे को आमतौर पर भगवान का प्रसाद माना जाता है। इसे सभी लोग श्रद्धा भाव से ग्रहण कर सकते हैं। लेकिन शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार इसे ग्रहण करने के कुछ नियम भी हैं।
यदि कोई आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति भंडारे का प्रसाद ग्रहण करता है, तो उसे किसी न किसी रूप में योगदान देना अनिवार्य होता है। यह योगदान धन, दक्षिणा या श्रम के रूप में हो सकता है, जैसे बर्तन धोना या भोजन परोसने में मदद करना। बिना योगदान के प्रसाद ग्रहण करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि यह लालच और असंयम का प्रतीक बन सकता है।
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आर्थिक रूप से कमजोर, जरूरतमंद या भिखारी व्यक्ति भंडारे में भोजन कर सकते हैं। उनके लिए कोई दोष नहीं माना जाता। शास्त्रों के अनुसार ऐसे लोगों के लिए भंडारे में भोजन करना पूण्यदायी और उचित है।