Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Shri Premanand Ji Maharaj: जीवन की दौड़ में अक्सर इंसान अपने भीतर उठने वाली बेचैनी, इच्छाओं और वासनाओं को दुश्मन मान लेता है। लेकिन संतों और महापुरुषों की दृष्टि इससे बिल्कुल अलग है। Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं कि यही भीतर की आग अगर सही दिशा में लग जाए, तो इंसान का जीवन ही नहीं, उसकी आत्मा तक बदल सकती है।
जैसे जेम्स वाट ने उबलते पानी से उठती भाप को बेकार जाने नहीं दिया और उसी से इंजन बना दिया, वैसे ही काम, क्रोध और लोभ की आग भी एक शक्ति है। अगर इस आग को भोग-विलास से शांत करने की कोशिश की जाए, तो आत्मिक शक्ति नष्ट होती है। लेकिन अगर इस बेचैनी को सहन करके भगवान की ओर मोड़ दिया जाए, तो यही आग ईश्वर तक पहुंचने का साधन बन जाती है।
आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए छह गुणों का होना जरूरी बताया गया है:
ईश्वर कोई दूर बैठी सत्ता नहीं है। श्रीकृष्ण उसी रूप में प्रकट होते हैं, जिस भाव से आप उन्हें याद करते हैं। कंस और शिशुपाल जैसे लोग भी उन्हें द्वेष में याद करते रहे और अंततः उन्हें प्राप्त हो गए। लेकिन आम व्यक्ति के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग है प्रेम और समर्पण। कहा गया है, “आप भगवान की ओर एक कदम बढ़ाइए, वे सौ कदम बढ़कर आते हैं।”
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पांचों इंद्रियां आज के समय में “मोबाइल देवता” बन चुकी हैं तुरंत सुख देती हैं, लेकिन आत्मा को खोखला कर देती हैं। सौभरि ऋषि जैसे तपस्वी भी इस जाल में फंस गए थे। ध्यान रखें, साधना में जो जलन और बेचैनी होती है, वही विरह की पीड़ा है और यही भगवान से मिलन की तैयारी।
गुरु भगवान की कृपा का स्वरूप होते हैं हजार माताओं का प्रेम और हजार पिताओं का अनुशासन। इस मानव जन्म को व्यर्थ न जाने दें। भले ही शुरुआत मजबूरी से हो, लेकिन मन से कहते रहें “मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं।” नाम जप और इंद्रिय संयम से वही दिन आएगा, जब जन्म-मरण का चक्र टूटेगा और प्रिय-प्रितम का साक्षात्कार होगा।