Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Life-Changing Daily Routine: Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं कि इस दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति सोना या ज़मीन नहीं, बल्कि समय है। यूरोप के एक धनवान व्यक्ति की वसीयत में पैसे या संपत्ति का नहीं, बल्कि केवल एक वाक्य लिखा था “दुनिया में समय ही पैसा है।”। इस सत्य को समझने के बाद हर एक पल की कीमत समझ में आती है। बेवजह की नींद, फालतू बातचीत और आलस्य जीवन की सबसे बड़ी चोरी है। जो व्यक्ति समय को संभाल लेता है, वही अपने जीवन को दिशा दे पाता है।
महाराज जी बताते हैं कि अगर जीवन बदलना है तो रोज़मर्रा की दिनचर्या में एक आदेश या एक नियम को पूरी निष्ठा से अपनाना जरूरी है। जो व्यक्ति एक आदेश का पालन कर लेता है, वह सौ आदेशों का पालन करने की शक्ति भी पा लेता है। लेकिन एक नियम तोड़ना, बाकी साधना को भी कमजोर कर देता है। यही अनुशासन है मन को साधना के अधीन कर देना।
जो साधक समय का सम्मान करता है, वही आगे बढ़ता है। अगर कहीं समय दिया है तो पहले पहुंचें, अगर भजन तय समय पर है तो उससे पहले उपस्थित हों। यह शरीर और सत्संग ईश्वर की कृपा हैं, इन्हें व्यर्थ न जाने दें।
हमें यह मानकर जीना चाहिए कि अगला पल अंतिम भी हो सकता है। निराशा और दुख में समय गंवाना मूर्खता है, क्योंकि हम अपने प्रिय, अपनी लाड़ली जी के पास ही लौटने वाले हैं। बीमारी और पीड़ा के बावजूद साधक की दिनचर्या नहीं टूटनी चाहिए। शरीर को महाराज जी “व्याधि मंदिरम्” कहते हैं। जब तक आंख, कान और वाणी स्वस्थ हैं, भजन में लगा दें, क्योंकि खोया हुआ समय वापस नहीं आता।
कई लोग भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं, लेकिन Shri Premanand Ji Maharaj मानते हैं कि पुरुषार्थ ही परम शक्ति है। नाम जप और दृढ़ प्रयास से भाग्य की बाधाएं भी कुचली जा सकती हैं। प्रभु को पाने के लिए वे केवल तीन बातें बताते हैं सत्य वचन, विनम्रता और हर स्त्री को मां के रूप में देखना। इनका पालन करने की जिम्मेदारी वे स्वयं लेते हैं।
चिंता से मुक्त होने का सूत्र है अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा में मिला देना। जैसा कि कहा गया है “जो जो प्यार करे सोए मोहे भावे”। विवेक से यह समझना जरूरी है कि मन की इच्छा क्या है और ईश्वर की मर्जी क्या। जब विरोध छोड़कर स्वीकार भाव आता है, तो जीवन में कृपा अपने आप बरसने लगती है।
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सच्चा साधक हर व्यक्ति में प्रभु को देखने का अभ्यास करता है। जो निंदा करे, उससे भी प्रेम रखे। किसी भी मंदिर, किसी भी भक्त या किसी भी स्वरूप की निंदा न करें, बल्कि श्रद्धा अर्पित करें।
महाराज जी कहते हैं कि उन्हें न मोक्ष चाहिए, न राज्य, न सिद्धियां। सादा जीवन और निरंतर सुमिरन ही उनका लक्ष्य है। जैसे सीमा पर खड़ा सैनिक हर पल सतर्क रहता है, वैसे ही साधक को हर सांस में “राधा” का नाम स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि मृत्यु कभी भी आ सकती है।