
उमर खालिद के पिता ने कन्हैया कुमार का जिक्र कर बड़ा बयान दिया (फोटो मोडिफाइड विथ एआई)
Umar Khalid Father Statement on Kanhaiya Kumar: दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पुराने विवाद और दोस्ती के किस्से एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को लेकर एक ऐसा भावनात्मक और तीखा बयान दिया है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कन्हैया अब पूरी तरह नेता बन चुके हैं और उनके पैरों में राजनीतिक मजबूरियों की बेड़ियां पड़ चुकी हैं, जिसके चलते वह पुराने साथियों के लिए आवाज उठाने में असमर्थ हैं।
सैयद कासिम रसूल इलियास ने जेएनयू में हुई हालिया नारेबाजी और विरोध प्रदर्शनों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए मौजूदा सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने समाज में बदल रहे चलन पर चिंता जताते हुए कहा कि आज के दौर में विरोध करना जैसे कोई बड़ा अपराध बन गया है। उनका कहना है कि अगर कोई छात्र अपनी आवाज उठाता है या नारे लगाता है, तो उस पर तुरंत एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट तैयार कर ली जाती है। वहीं दूसरी तरफ, बलात्कारियों और गंभीर अपराधियों को अदालत से आसानी से जमानत मिल रही है। यह दोहरा रवैया अब आम बात हो गई है।
उमर खालिद के पिता ने अपने बेटे की जमानत याचिका बार-बार खारिज होने को सीधे तौर पर एक बड़ी राजनीतिक साजिश करार दिया है। उन्होंने दावा किया कि जब दिल्ली में दंगे हुए, उस वक्त उमर वहां मौजूद भी नहीं था और न ही जांच एजेंसियों के पास उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत हैं। इसके बावजूद उसे लगातार जेल में रखा जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि उसी एफआईआर में नामजद कुछ अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन उमर के साथ जानबूझकर भेदभाव किया जा रहा है। इलियास के मुताबिक, सबूतों की कमी के बावजूद बेल न मिलना यह साबित करता है कि यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक निशाना बनाया जा रहा है।
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इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा चर्चा कन्हैया कुमार पर दिए गए उनके बयान की हो रही है। कासिम रसूल ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि 2016 के जिस चर्चित मामले में कन्हैया आरोपी थे, उसी में उमर भी उनके साथ सह-आरोपी थे। दोनों जेएनयू में सहपाठी रहे हैं, लेकिन आज कन्हैया ने इस मुद्दे से पूरी तरह दूरी बना ली है। उन्होंने कहा कि कन्हैया अब एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ चुके हैं और अपने राजनीतिक हितों को दोस्ती से ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। पिता का कहना है कि यह अजीब लगता है, लेकिन सच यही है कि कन्हैया की राजनीतिक मजबूरियां उनके पैरों में बेड़ियां बन गई हैं और इसके बारे में अब कुछ खास नहीं किया जा सकता।






