मिड डे मील वर्कर (सौजन्य सोशल मीडिया)
School nutrition workers demand: सुबह सबसे पहले स्कूल पहुंचकर ताला खोलना, फिर झाड़-पोंछा करना। उसके बाद खाना बनाने की तैयारी। भोजन का समय होते ही हर बच्चे को प्यार से परोसना, खिलाना, फिर बर्तन धोना, दोबारा स्कूल की सफाई, स्कूल छूटने के बाद सभी कमरों में ताले लगे हैं या नहीं, यह सुनिश्चित कर घर लौटना। इतनी जिम्मेदारियों से भरे इस दिनचर्या वाले व्यक्ति का वेतन कितना होना चाहिए?
सिर्फ ढाई हजार रुपये! जी हां, स्कूल के लिए दिनभर मां की तरह मेहनत करने वाली शालेय पोषण आहार कर्मचारी महिला की मेहनताना मुट्ठी भर गांवों के गरीब बच्चों की पढ़ाई जिला परिषद और नगर परिषद की शालाओं में होती है। उन्हें पेटभर भोजन देने की जिम्मेदारी सरकार ने ली है, लेकिन वही भोजन पकाने वाली महिला कर्मचारी से पूरे दिन काम करवाकर मात्र ढाई हजार रुपये मानधन दिया जा रहा है।
शालेय पोषण आहार योजना वर्ष 1995 में शुरू हुई। लेकिन करीब 25 वर्षों तक भोजन बनाने वाली महिलाओं से मात्र एक हजार रुपये में काम करवाया गया। बाद में यह मानधन बढ़कर डेढ़ हजार हुआ और अब राज्य सरकार ने अपने हिस्से की राशि बढ़ाकर इसे 2500 रुपये किया है।
एक ओर सरकार ‘लाडली बहन योजना’ के तहत लाखों महिलाओं को हर माह 1500 रुपये “मदद” के रूप में दे रही है, वहीं दूसरी ओर स्कूलों में दिनभर मेहनत करने वाली रसोइया महिलाओं को उनका हक का मानधन भी समय पर नहीं दिया जाता।
मानधन समय पर मिले तब भी ढाई हजार रुपये में पूरे महीने घर कैसे चलाया जाए, यह सवाल जस का तस बना हुआ है। इसलिए इन महिलाओं की मांग है कि या तो मानधन में वृद्धि की जाए या न्यूनतम वेतन लागू किया जाए, लेकिन शिक्षकों को लाखों रुपये वेतन देने वाली सरकार, इन मेहनतकश महिलाओं को “मां आखिर करती क्या है?” कहकर नजरअंदाज कर रही है।
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पोषण आहार कर्मचारियों के मानधन में वृद्धि करना राज्य सरकार के ही हाथ में है। कुछ राज्यों में 14 हजार रुपये मानधन दिया जाता है, फिर प्रगतिशील महाराष्ट्र में यह क्यों संभव एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री रहते हुए मानधन बढ़ाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब सरकार उसे भूल गई है।
– कॉ. दिवाकर नागपुरे, राज्य उपाध्यक्ष, आयटक शालेय पोषण आहार कर्मचारी यूनियन