प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Wardha Rural Education Crisis: वर्धा शिक्षा से कोई भी वंचित न रहे, इसके लिए शासन की ओर से करोड़ों रुपये का खर्च किया जाता है। बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्रों में कान्वेंट और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का बढ़ता क्रेज जिला परिषद के स्कूलों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। इसका सीधा असर जि.प. स्कूलों की छात्रसंख्या पर पड़ रहा है, जो दिन-ब-दिन घटती जा रही है।
साथ ही बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षकों के रिक्त पदों की समस्या ने ग्रामीण जि.प. स्कूलों की स्थिति को और गंभीर बना दिया है। जिले में कुल 906 जिला परिषद स्कूल संचालित हैं, जहां गरीब, जरूरतमंद और सामान्य वर्ग के बच्चे विभिन्न विषयों का अध्ययन कर ज्ञान अर्जन करते हैं।
लेकिन शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण के चलते कई स्कूल धीरे-धीरे वीरान होते जा रहे हैं। कई स्कूलों में शिक्षकों के पद लंबे समय से रिक्त होने के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
पिछले कई वर्षों से शिक्षकों की नई भर्ती नहीं हो सकी है। वहीं, जिले में उच्च श्रेणी के मुख्याध्यापकों के 25 पद अब भी रिक्त पड़े हैं, जिससे प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
जिला परिषद स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। ऐसे में छात्र संख्या के आधार पर ही शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है। हाल ही में कुछ स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम होने के कारण शिक्षा विभाग की उन स्कूलों के छात्रों को अन्य स्कूलों में स्थानांतरित करने की स्थिति का सामना करना पड़ा था।
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आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में हर अभिभावक अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास कर रहा है। शहरों के साथ-साथ गांवों में भी शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाने लगा है, इसी कारण प्रतिस्पर्धा में बच्चे को आगे बनाए रखने के लिए अभिभावकों का झुकाव अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर बढ़ रहा है। वहीं जिप स्कूलों के शिक्षकों को एक-एक छात्र का दाखिला कराने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।