Badlapur Victim School Fees: दो साल बाद भरी गई पीड़ित छात्रा की फीस, 10 लाख की मदद अब भी अधूरी
Badlapur Victim School Fees: बदलापुर की पीड़ित छात्रा की स्कूल फीस आखिरकार सरकार ने भर दी है, लेकिन 10 लाख रुपये की घोषित आर्थिक सहायता अब तक नहीं मिली। परिवार ने न्याय में देरी पर नाराजगी जताई है।
- Written By: अपूर्वा नायक
बदलापुर पीड़िता की स्कूल फीस (सौ. सोशल मीडिया )
Badlapur Victim School Fees Government Aid: स्कूल बैग के साथ दर्द का बोझ साथ लेकर चल रही बदलापुर की मासूम लड़की की जिंदगी का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। राज्य को हिला देने वाली इस घटना को भले ही दो साल बीत चुके हैं, लेकिन इंसाफ और पुनर्वास का इंतजार ख़त्म नहीं हुआ है।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तरफ से आवाज उठाये जाने के बाद आखिरकार प्रशासन जागा है। सरकार ने उसकी पढ़ाई के लिए कुछ कदम उठाए हैं और पिछले दो सालों के साथ-साथ इस साल की भी स्कूल फीस भर दी है। लेकिन, परिवार के लोग नाखुश हैं। कारण 10 लाख रुपये की घोषित आर्थिक मदद सिर्फ कागजों पर है।
फीस के लिए बच्ची को परेशान कर रहा था स्कूल प्रबंधन
आदर्श विद्या मंदिर में हुई घटना के बाद, राज्य सरकार ने घोषणा की थी कि वह पीड़ित बच्ची की स्नातक तक की पढ़ाई की जिम्मेदारी लेगी, लेकिन जानकारी सामने आई थी कि स्कूल लगातार उससे फीस के लिए परेशान कर रहा है।
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जानकारी मिलने के बाद मनसे महासचिव संदीप पाचंगे ने पहल करते हुए 32,000 रुपये की बकाया फीस भरी और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को पत्र लिखकर प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाया। इसके बाद शिक्षा विभाग ने कार्रवाई की और बकाया फीस भरी शिक्षा विभाग अधिकारियों ने यह भी बताया कि अगले दो साल की पढ़ाई के लिए एक प्रपोजल तैयार किया गया है।
सरकार ने फीस भर दी। यह सही हुआ। यदि सरकार जिम्मेदारी से बचती भी, तो हम पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते। जब तक शिक्षा मंत्री ने जो मदद बताई है, वह असल में नहीं मिल जाती, हम कोशिश करना बंद नहीं करेंगे।
– संदीप पाचंगे, महासचिव, मनसे
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कागजों में सिमटी 10 लाख की मदद
- हालांकि, घटना के बाद घोषित की गई 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद अभी तक पीडित बच्ची को नहीं मिली है।
- पीड़िता के माता-पिता ने यह सवाल उठाया है, फीस भर दी गई है, यह अच्छी बात है।
- लेकिन लड़की के भविष्य और रिहेबिलिटेशन के लिए अनाउंस की गई मदद अभी तक क्यों नहीं मिली? उन्होंने इस बात पर भी अफसोस जताया कि अदालती प्रक्रिया चलने के दौरान उन्हें मदद के लिए सरकारी कार्यालयों के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे हैं।
