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संत गाडगे महाराज: हाथों में झाड़ू और कीर्तन से बदल दी समाज की सोच, क्यों कहा जाता है उन्हें ‘क्रांतिकारी संत’?
- Written By: आकाश मसने
Gadge Maharaj Jayanti: संत गाडगे बाबा ने कीर्तन के माध्यम से अंधविश्वास और गंदगी के खिलाफ जंग छेड़ी। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर पत्थर में नहीं, बल्कि मानवता की सेवा और स्वच्छता में बसता है।

संत गाडगे महाराज (सोर्स: सोशल मीडिया)
Sant Gadge Maharaj Biography: महाराष्ट्र की भूमि महान संतों की परंपरा के लिए जानी जाती है, लेकिन इनमें डेबूजी झिंगराजी जानोरकर का स्थान बेहद विशिष्ट है। उन्हें दुनिया संत गाडगे बाबा के नाम से जानती है। आज उनकी 150वीं जयंती के अवसर पर पूरा देश उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को याद कर रहा है। गाडगे बाबा केवल एक संत नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक और अद्वितीय कीर्तनकार थे, जिन्होंने कीर्तन के पारंपरिक माध्यम को समाज में बदलाव का सबसे सशक्त हथियार बनाया।
संत गाडगे महाराज का जन्म महाराष्ट्र के अमरावती जिले के वर्तमान अंजनगांव सुरजी तालुका के शेंडगांव में एक धोबी पिछड़े वर्ग के कृषक परिवार में हुआ था। एक सार्वजनिक शिक्षक के रूप में, वे अपने भोजन के पैन को सिर पर उलटा करके और अपने ट्रेडमार्क झाड़ू को लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते थे।
कीर्तन के माध्यम से लाई वैचारिक क्रांति
महाराष्ट्र में कीर्तन की कई पद्धतियां प्रचलित हैं, जैसे नारदीय, रामदासी और वारकरी कीर्तन। हालांकि, जानकारों का मानना है कि गाडगे बाबा ने अपनी कीर्तन शैली से पीढ़ियों का निर्माण किया। तुकाराम महाराज के वंशज और संत परंपरा के अभ्यासी डॉ. सदानंद मोरे के अनुसार, गाडगे बाबा एक सच्चे वारकरी थे जिन्होंने वारकरी संप्रदाय में एक ‘बड़ी हलचल’ पैदा कर दी। उन्होंने हिंदू धर्म की सामाजिक विरासत और उसके क्रांतिकारी स्वरूप को उसी तरह उजागर किया, जैसे स्वामी विवेकानंद ने किया था।
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संत गाडगे महाराज (सोर्स: सोशल मीडिया)
ईश्वर पत्थर में नहीं, इंसानियत में है
अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष श्रीपाल सबनीस का मानना है कि गाडगे बाबा की तुलना किसी और से संभव नहीं है। बाबा ने अध्यात्म और देवत्व के मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात किया था। उनका स्पष्ट संदेश था कि भगवान पत्थरों में नहीं, बल्कि उन लोगों के कल्याण में है जो पीड़ित और जरूरतमंद हैं। उन्होंने पारंपरिक संत परंपरा को पुरानी रूढ़ियों और चौखटों से मुक्त कर समाज को एक नया ‘खुलापन’ प्रदान किया।
स्वच्छता: मन की और समाज की
गाडगे बाबा का कीर्तन प्रबोधनकारी और कल्याणकारी था। वे जिस गांव में जाते थे, वहां खुद झाड़ू उठाकर सफाई करने लगते थे। उनका मानना था कि गांव साफ करने के साथ-साथ कीर्तन के माध्यम से लोगों के मन की गंदगी (अंधविश्वास और अज्ञानता) को भी साफ करना जरूरी है। साहित्यकारों के अनुसार उनका कीर्तन ‘भौतिकवादी’ था क्योंकि वे चाहते थे कि इंसान भौतिक रूप से भी सुखी और समृद्ध बने।
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कथनी और करनी में समानता
संत साहित्य के जानकार प्राध्यापक उदय जाधव बताते हैं कि गाडगे बाबा एक ‘क्रियाशील संत’ थे। उन्होंने हमेशा ‘पहले किया, फिर बताया’ के सिद्धांत पर अमल किया। फटे-पुराने कपड़े (चिंध्या) पहनने वाले इस संत ने समाज को सोने जैसे अनमोल विचार दिए। प्रसिद्ध भारुड़कार चंदाताई तिवाड़ी उनके व्यक्तित्व की महानता का उल्लेख करते हुए बताती हैं कि बाबा जिस गांव में कीर्तन के लिए जाते थे, वहां का भोजन तक ग्रहण नहीं करते थे। यह उनके निस्वार्थ भाव और नैतिकता का प्रतीक था।
आधुनिक कीर्तनकारों के लिए संदेश
आज के दौर में जहां कीर्तनकारों पर कॉमेडी करने या पैसों के लिए काम करने के आरोप लगते हैं, गाडगे बाबा का जीवन एक आदर्श प्रस्तुत करता है। वे कीर्तन के लिए अग्रिम राशि लेने के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने तुकाराम महाराज के उस संदेश को जीया जिसमें सभी वर्गों और स्त्री-पुरुषों का समान आदर करने की बात कही गई है। उनका जीवन व्यसनमुक्ति, शिक्षा और स्वच्छता का एक ऐसा महाकुंभ था जिसने महाराष्ट्र की सामाजिक चेतना को हमेशा के लिए बदल दिया।
Sant gadge baba jayanti maharashtra social reformer cleanliness and education legacy
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