एनसीपी नेता संजय पाटिल (सोर्स: सोशल मीडिया)
Sangli Zilla Parishad President Election: महाराष्ट्र की राजनीति में सांगली जिला हमेशा से सत्ता संघर्ष का केंद्र रहा है। हाल ही में हुए जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव ने एक बार फिर जिले की राजनीतिक दिशा बदलने के संकेत दे दिए हैं। इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाला मोड़ पूर्व सांसद संजय पाटिल का रुख रहा, जिन्होंने लंबे समय की दूरी के बाद फिर से भारतीय जनता पार्टी के करीब आने के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
संजय पाटिल के कट्टर समर्थक और मणेराजुरी जिला परिषद गुट के सदस्य शशिकांत जमदाडे ने चुनाव के दौरान बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया। इस एक वोट ने न केवल चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया, बल्कि सांगली के गलियारों में यह चर्चा छेड़ दी कि संजय पाटिल अब बीजेपी की मुख्यधारा में फिर से सक्रिय होने के लिए तैयार हैं।
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर की फूट रही। चुनाव प्रक्रिया के दौरान सुनेत्रा पवार गुट के सदस्यों के बीच गहरे मतभेद उभर कर सामने आए। मतदान के समय नेताओं के बीच की असहमति इतनी स्पष्ट थी कि इसने सत्ता के स्थापित समीकरणों को बड़ा झटका दिया। गुटबाजी के चलते अजीत पवार समर्थकों की पकड़ ढीली पड़ती नजर आई, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, संजय पाटिल शुरुआत में शरद पवार गुट के कद्दावर नेता और विधायक जयंत पाटिल के संपर्क में थे। राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे थे कि वे विपक्षी गठबंधन के साथ जा सकते हैं। हालांकि, ऐन वक्त पर पाटिल ने अपनी रणनीति बदली और बीजेपी नेतृत्व के साथ तालमेल बिठाया। अंतिम क्षणों में हुए इस गठबंधन ने न केवल बीजेपी को मजबूती दी, बल्कि सांगली में संजय पाटिल के राजनीतिक प्रभाव को भी फिर से स्थापित कर दिया।
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संजय पाटिल और बीजेपी के बीच फिर से बढ़ती इस नजदीकी ने सांगली की राजनीति को दिलचस्प बना दिया है। क्या यह सिर्फ एक स्थानीय चुनाव का समझौता है या आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए किसी बड़े गठबंधन की नींव? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल सांगली में बीजेपी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।