Pune Smart City की हकीकत: विकास के बीच बेघर लोगों की जंग, पुणे में पुनर्वास योजनाएं कागजों तक सीमित
Pune Smart City बनने की चमक के पीछे बेघर परिवारों की कड़वी सच्चाई छिपी है। सैकड़ों लोग फुटपाथ पर जीवन जी रहे हैं, जहां उन्हें न आवास मिलता है और न बुनियादी सुविधाएं।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे न्यूज (सौ. फाइल फोटो )
Smart City Pune Homeless Families: पुणे आज आधुनिक इमारतों, मेट्रो परियोजनाओं और ‘स्मार्ट सिटी’ की पहचान के साथ देश के अग्रणी शहरों में गिना जाता है।
लेकिन इस चमकदार विकास के पीछे एक ऐसी सच्चाई भी मौजूद है, जो अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। शहर में सैकड़ों परिवार फुटपाथ पर जीवन जीने को मजबूर हैं।
पुलगेट, स्वारगेट, घोरपड़े पेठ और महानगर पालिका क्षेत्र के आसपास खुले आसमान के नीचे रह रहे इन परिवारों के पास न तो सुरक्षित आवास है और न ही बुनियादी सुविधाएं, फुटपाथ पर जी रहे ये परिवार विकास की चकाचौंध के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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छूटा गांव, शहर में भी नहीं ठिकाना
महाराष्ट्र के बार्शी, मावल और अन्य ग्रामीण इलाकों से रोजगार की तलाश में यह परिवार शहर आया है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में पुणे पहुंचे ये लोग यहां भी स्थायी ठिकाना नहीं बना पाए, एक निवासी ने बताया कि गांव में रहने के लिए घर तो है, लेकिन वहां आय का कोई साधन नहीं है, जबकि शहर में काम तो मिल जाता है, पर रहने के लिए जगह नहीं।
मजबूरी में ये परिवार प्लास्टिक, टीन और कागज से अस्थायी झोपड़ियां बनाकर जीवन गुजार रहे हैं। तेज धूप, बारिश और ठंड जैसी परिस्थितियां इनके लिए रोज की चुनौती हैं। अधिकारियों के मुताबिक, येरवडा के पास मदर टेरेसा हॉल में 26 (पुरुष), सेनादत्त पुलिस चौकी केंद्र में 20 (महिला) और 43 (पुरुष), मोलेदिना प्लाजा में 22 (महिला) और 25 (पुरुष) जगह उपलब्ध है।
योजनाओं के लाभ से वंचित, पुनर्वास योजनाएं कागजों पर
सरकारी योजनाओं का लाभ भी इन्हें पूरी तरह नहीं मिल पाता, कुछ के पास पहचान पत्र तो है, लेकिन राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेजों की कमी उन्हें योजनाओं से दूर कर देती है। महिलाओं के लिए हालात और कठिन हैं।
खुले में रहना उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है, वहीं स्वच्छता के लिए उन्हें सार्वजनिक शौचालयों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसके लिए रोजाना पैसे खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि, शहर में बेघर लोगों के लिए पांच नाइट शेल्टर संचालित किए जा रहे हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है और सभी जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं बन पाती। कई परिवार 10 से 20 वर्षों से फुटपाथ पर ही जीवन बिता रहे है। उन्होंने आवास के लिए आवेदन भी किए, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिली।
समाज विकास विभाग की सूचना के बाद अतिक्रमण विभाग द्वारा सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर झोपड़ियां बनाकर रहने वाले लोगों पर कार्रवाई की जाती है, लेकिन उन्हें आगे कहां भेजा जाए, इस पर कोई ठोस नियम तय नहीं है। हम केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करते हैं। नागरिकों को कहां पुनर्वसित करना है। इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है।
– सोमनाथ बनकर, उपायुक्त, अतिक्रमण विभाग, पीएमसी
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शिक्षा की चाह, लेकिन हालात आड़े
शिक्षा के मामले में भी स्थिति चिंताजनक है। भले ही अधिकांश वयस्क अशिक्षित हैं, लेकिन ये अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। कुछ बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते उनकी पढ़ाई छूट जाती है। किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है। कई बच्चे सिग्नल पर सामान बेचते हैं, जिससे उनका भविष्य प्रभावित होता है। जीविका के लिए ये लोग दिहाड़ी मजदूरी, कचरा बीनने या छोटे-मोटे काम करते है। उनकी आय ठीक-ठाक हो जाती है, लेकिन भोजन, पानी, स्वास्थ्य और अन्य जरूरतों में ही पूरी कमाई खर्च हो जाती है।
पुणे से नवभारत लाइव के लिए गायत्री माली की रिपोर्ट
