
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Pune News In Hindi: शिरूर तहसील की राजनीति में एक अनोखा मोड़ देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ने वाले वर्तमान विधायक माऊलि कटके और पूर्व विधायक अशोक पवार अब एक साथ आ गए हैं।
वरिष्ठ स्तर पर राकां के दोनों गुटों के बीच गठबंधन और ‘मनोमिलन’ तो हो गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच की खाई अभी भी बरकरार है। नेताओं के हाथ मिलाने से कार्यकतों भ्रमित है कि वह कल तक के अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ तालमेल कैसे बिठाए।
दलबदल के कारण कई जिला परिषद गट में मुकाबला बेहद रोचक हो गया है:
कवठे टाकली हाजी गटः यहां पूर्व विधायक पोपटराव गावड़े और उनके परिवार ने भाजपा का दामन थाम लिया है। अब मुकाबला भाजपा के राजेंद्र गावड़े और राष्ट्रवादी के दामू घोडे के बीच है।
रांजणगांव-कारेगांव गटः यहां का मुकाबला पारिवारिक जंग में बदल गया है। दो जेठानियां, स्वाति पाचुंदकर (भाजपा) और ज्योति पाचुंदकर (राकां) एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। वहीं शिवसेना की अर्चना शिंदे ने उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
शिक्रापुर-सणसवाडी गटः यहां राष्ट्रवादी ने मोनिका हरगुडे को उम्मीदवार बनाया है, जिससे नाराज होकर कुसुम मांढरे ने बगावत कर दी और निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया है।
तलेगांव रांजणगाव सांडस और न्हावरा जैसे जिला परिषद गट में भी स्थिति गंभीर है। यहां भाजपा और राष्ट्रवादी दोनों ही दलों ने ऐन वक्त पर दल बदल कर आए नेताओं को टिकट दिए हैं, जिससे पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
तलेगाव में रेखा बादल और दीपाली गव्हाणे के बीच मुकाबला है, जबकि कई इच्छुक उम्मीदवारों ने निर्दलीय मोर्चा खोल दिया है। न्हावरा में भाजपा ने मालती पाचर्णे को उतारा है, जिनके सामने राष्ट्रवादी की वृषाली वालके चुनौती पेश कर रही है।
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शिरूर में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि नेताओं ने तो गठबंधन कर लिया है, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बिठाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। दादा पाटिल फराटे और सुधीर फराटे जैसे नेताओं द्वारा बनाई गई ‘स्थानीय आघाडी’ ने सभी स्थापित दलों की चिंता बढ़ा दी है।






